Friday, December 27, 2013

tanu thadani ki kavitaayen एक बार तो कहना मुझे तनु थदानी की कविताएँ

आनंद को पाने के लिये ,
नाचते-गाते लोग ,
सहवास करते लोग ,
भजन -कीर्तनों में डूबते लोग ,
नहीं पाते होंगे आनंद,
एक बार कहना उन्हें ,
दूसरों को आनंद दे कर तो देखे इक बार!

जीने  के लिये ,
युद्ध सी दिनचर्या को लपेटे लोग ,
अक्ल से नंगे ,
घड़ी की सुइयों पे लेटे लोग ,
जी नहीं पाते अक्सर ,
जीवन जीने हेतु मरते-मारते हैं रहते,
एक बार  कहना उन्हें ,
दूसरों को  आराम से जीने तो दे एक बार!

कोई  शोध  नहीं करना ,
कोई  राजनीति नहीं करना ,
अगर  आनंद से जीना है तो ,
जीने का आनंद  लेते- लेते मरना !
एक बार तो कहना मुझे ,
कि तुम्हें जीना है आनंद से इस बार  !!

Tuesday, December 17, 2013

तनु थदानी की कविताएँ आ जाओ फिर से tanu thadani ki kavitayen aa jaao fir se

रोया मैं बिछड़ कर तुमसे ,
लगा धुल कर मेरी आंखों से,
जिंदगी फिसल गयी !
कुछ तो था मेरे भीतर सुलगता सा,
अरे ! क्या तुम थी ??
तभी तो मेरी मौत जल गयी !

प्रेम का अपना ही व्याकरण है होता ,
प्रेम का अपना ही शब्दकोष होता है ,
जब हम नहीं मानते उस शब्दकोष को ,
सरल सा प्रेम एक पेचीदेपन में खोता है !

जब मैं तुम्हारे भीतर चल रहा था ,
तुम चल  रही थी मेरे भीतर ,
पता  नहीं चलने दिया कमबख्त उम्र ने ,
कि कब कैसे तुम मेरी आदतों में ढल गयी !

जीवन की महफिलों में ,
हंसी में , मुस्कुराहट में ,
आलिंगन से ले कर नशीली चाहत में ,
वादों का खजाना मिला हर दामन में !
गठबंधनों के सैलाब में ,
घुल गयीं जिंदगीयां ,
सब मिला , बस प्रेम की कमी खल गयी !

क्या आज भी प्रेम होता है ?
आ जाओ फिर से ,
तुम आखरी साक्ष्य बनोगी प्रेम का ,
मेरे पास बची हैं कुछ सांसे , संभालो उसको ,
अनगिनत सांसे तो तुम्हें याद करते - करते ही निकल गयीं !


Sunday, September 22, 2013

तनु थदानी की कवितायें हवा की शिकायत जायज़ थी tanu thadani ki kavitaayen hawa ki shikaayat jaayaz thi

गन्दी  बदबूदार  नालियों  के  पानी  से ,
नहा  के  निकली ,
मंगलसूत्र  ठीक  किया ,
काजल -  बिंदी - लिपिस्टिक  लगायी ,
घर  आ  कर  परिवार  ओढ़  लिया  !

हवा  के  चप्पे- चप्पे  पर  फैली  गंध  ने ,
कभी  नहीं  बख्शा  उसे ,
हवा  की  शिकायत  जायज़  थी ,
खुद  को  मैला  किया  फिर  गंध  हवा   में क्यूँ  मिलायी ?
पायल  तो  आवाज़  कर  देती  है  सो  फेंक  दिया ,
पैरों  से  चाल  जानी  जाती  है , चलन  नहीं ,
फिर  पैरों  को क्यूँ  सिकोड़ा  मोड़  लिया  ??

आप  जब  खुद  को  देते  हैं  धोखा ,
तब  आप  खुद  ही  से  खुद  को छिपाते  हैं !
उसकी  तो  कोई  मज़बूरी  ही  रही  होगी ,
जो  सब  जानता  है  फिर  भी  साथ  है  रहता ,
परिवार  रहे  जुड़ा  सो  उसने  देर  ना  लगायी ,
उस  शख्स  ने  चुपचाप  अपना  दिल  ही  तोड़  लिया !!  








Wednesday, August 14, 2013

तनु थदानी की कवितायें मेरे बेटे को कभी ना रुलाना tanu thadani ki kavitaayen mere bete ko kabhi naa rulaana

बस  मांगी  थी  इक  मुस्कान ,
बेटे  ने  वो  पूरा  पार्क  ही  तोहफ़े  में  दे  दिया, 
जहाँ  सुबह -सुबह , 
समूह  बना कर  जोर -जोर  से  हँसते  लोग जमा  होते  हैं !
फिर  कभी  कुछ  नहीं माँगा  बेटे  से ,
फिर  कभी पता  तक  नहीं  चलने  दिया ,  
कि , हम  भी  कभी  रोते  हैं !!

पार्क  में  जोर-जोर  से  हँसते  लोग ,
इक  दूसरे  पर  ही  तो  हँसते  हैं  !
हम  शहरी  लोग  उम्र  के  आखरी  पड़ाव  में ,
ऐसे  ही  किसी पार्क  में ,
टूटे - फूटे  समूहों  में  स्वत : स्वत : फंसते  हैं !

कच्ची  बुनियादों  पे  खड़ी  दीवालें  ,
ता -उम्र  रोती  हैं ,  
बेशक  समझदार  लोग  बताते  हैं  ,
वो  तो  नमी  होती  है !
नम  दीवालों    पे  बड़ा सा  मुस्कुराता  फोटो  लगाते  हैं ,
कम  से   कम  खर्च  में  पूरी  दीवाल   छिपाते  हैं !
सचमुच  हम  ही  बुद्धू  थें ,
आजकल  के  बेटे  तो  समझदार  होते  हैं ,
उन्हें  सब  होता  है  पता ,
कि , हम  कब - क्यूँ - कैसे  रोते  हैं ! 

हे  ईश्वर ,
हमने  तो  क्षमा  का  भुगतान ,
अपनी  साँसों  से  कर  दिया ,
मेरे  बेटे  को  कभी  ना  रुलाना ,
बेटे   हमारे  अपने  बचपन  सहीत ,
अब  भी  हमारे  दिलों  में  बसते  हैं !!   










    

Monday, August 12, 2013

तनु थदानी की कवितायें प्रेम में रखो केवल भावना tanu thadani ki kavitaayen prem me rakho kewal bhawukta

जुबां  से  दिल  और  दिमाग  की  दूरी  तो ,
होती  है  बराबर ,
लेकिन  जुबां  पर  क्यूँ  दिमाग  ही  सवार  होता  है ?
अगर  होता  जुबां  में  दिल ,
या  होती  दिल  में  जुबां , 
सच  कहता  हूँ , 
हम  भूल  जाते ,  कि ,
ग़लतफ़हमी  का  मतलब  क्या  होता  है !

जीना  तो  किसी  की  आँखों  में  जीना ,
पीना  तो  किसी  की  आँखों  से पीना ,
अंधकार  तो  सब  निगल  जाता  है , 
क्या  सूरज  ने  कभी  कुछ  छीना ?
सूरज  तो  सबको  बराबर  धूप  बाँटता  है , 
मिलेगी  तुझे  भी  तेरे  हिस्से  की  धूप , 
पगले  तू  क्यों  रोता  है ??

जिन - जिन  को  चाहिये  प्यार  के  बदले  प्यार 
सब  वो  पश्चिम  जायें, 
जिन्हें  बदले  प्यार  के  कुछ  ना  चाहिये ,
मेरे  पीछे  पूरब  आयें !
रास्ता  दूर  है  मगर  मंजिल  मिलेगी , 
आशा  की  इक  किरण  भी  इधर  से  ही  खिलेगी ,
क्यों  कि  ये  निश्चित  है  कि ,
सूरज  का  उदय  पूरब  से  ही  हर  बार होता  है !

अगर  हम  जुबां  पे  राज  करें ,
तो  हम  जुबां  से  राज  करेंगे ! 
अगर  हाथ  ना  मिलायें ,
हम  केवल  दिल  मिलायें , 
तो  शातिर  दुखों  का  पर्दाफ़ाश  करेंगे !
अपनी  गर्दन  पे  केवल  अपना  सिर  रखो  ना , 
क्यूँ   दूसरों  के  सिर  को  बेकार  ढ़ोता  है  ??

प्रेम  को  परिभाषित  करने  में , 
केवल  उम्र  की  लकड़ियाँ  न  तोड़ो ,
केवल  और  केवल  प्रेम  करो , 
मगर  अपनी  भावुकता  तो  छोड़ो !
प्रेम  में  रखो  केवल  भावना , 
भावुकता  में  तो  केवल  शब्दों  का  खिलवाड़  होता  है !!     










Saturday, July 20, 2013

तनु थदानी की कवितायें है कहाँ प्रेम ?? tanu thadani ki kavitaayen hai kahan prem ??




मैं  प्रेम   की  कविता  नहीं  लिखुंगा  कभी ,
किसके  लिये लिखूं  ?
है  कहाँ  प्रेम  ??
हमारे  समाज  में  प्रेम  मात्र  कविता  में  बचा  रह  गया  है !

अगर  न  रोने   का  वादा  करो  तो  मैं दिखाऊंगा  तुम्हे , 
प्रेम  का क्षत - विक्षिप्त  शव  छपरा के  अस्पताल  में !
अभी  तक  मांओं  के  आंसुओ  के  निशान  ताजा  हैं ,
कभी  ना  रोने  वाला  पिता  भी है  बिलखता - रोता !
जारी  है  मौत  की  सरसराहट ,
एक   बिस्तर  से  दूसरे  बिस्तर ,
छटपटाती  मासूम  जिंदगियों  के  अगल - बगल !
क्या  प्रेम  है  बचा  हमारे  समाज  में ?
अगर  होता  तो  ये  दृश्य  ना  होता !!

नेताओं  की  खिली  बाँछों  में ,
राजनीति  से  प्रेम  नजर  आता  है !
उस  बनिये  का  पैसे  से  प्रेम  समझ  आता  है !
दलाल  दर  दलाल  कमीशन - प्रेम  मंडराता  है !
सभी  व्यस्त  हैं  अपने  प्रेम की  परिभाषा   को चुस्त  रखने  में !
ये  भी  कोई  शोध  का  विषय  है ,
कि गाँव  का  बच्चा  मिड- डे  मील क्यों  खाता है ??  

प्रेम -रस  में  डूबे  शब्दों  के  लूटेरे ,
अध्यात्म  की  चाश्नी  बेचने  वाले  हजारो  डेरे ,
कितनी  सहजता  से आँखे  मूंद  निकल  गयें  सुबह -सुबह ,
उन्हें  तो  प्राणायाम  करना  था  ना !!

मैं  प्रेम  के  जज्बातों  के  साथ  नहीं  दिखुंगा  कभी ,
किसके  लिये  दिखुं ?
है  कहाँ  प्रेम  ??


तुम  राजनीति  करते  लोग ,प्रवचन  करते  लोग ,व्यापार  करते  लोग 
सब  हो  हत्यारे  प्रेम  के !!
मैं  नहीं  कह  रहा  ये  सब ,
गौर  से  सुनना  आवाज  अभी  तक  गूंज  रही  है ,
प्रेम  से  वंचित  वो  गाँव  का  बच्चा 
अस्पताल  में  मरने  से  पहले  कह  गया  है !!
  

  

Wednesday, July 10, 2013

तनु थदानी की कवितायें हम तो आखिर इंसान हैं ना tanu thadani ki kavitaayen ham to aakhir insaan hain naa




हम  प्यार  करना  क्यों  नहीं  सीख  पाते ?
गवां    देते  हैं  पूरी  उम्र ,
शादी  करते  हैं ,
बच्चे  होते  हैं ,
और  बूढ़े  हो  जाते  हैं ,
फिर  अफ़सोस  करते  हैं ,
कि ,  सब  किया जीवन  में , मगर  प्यार  क्यों  नहीं किया ?  

पहले  घर  लेते  हैं ,
उसमे  परदे - फर्नीचर  लगाते  हैं,  
फिर  रिश्तों के  हिसाब से बने  कमरों  में ,
खुद   को  कैद  कर  पूरी  खामोशी  से  चिल्लाते  हैं ,
कि ,  हमने  मकान  क्यूँ  लिया , घर  क्यूँ  नहीं  लिया  ?

करोड़ो  कीड़ों - मकोड़ों  के  बीच ,
अपरिचित सी  शक्ल  लिये ,
जीवन  गुजारते  हम , हमारे  दोस्त  , हमारे  अपने ,
मर  जाते  हैं  अंततः  हम  सब ,
मगर  समझ  नहीं  पाते कि , 
हम  तो  आखिर  इंसान  हैं  ना ,
फिर  जीवन  उन  कीड़ों  से  हट  कर  क्यूँ  नहीं  जीया  ?

चलो  आज  से  बजाय  खिड़कियों  पे  परदे   लगाने  के ,
खिड़कियों  के  बाहर की  दुनियाँ  को  साफ़  करते  हैं !
दूसरों  के  खिलाफ़  नहीं  ,
आज  से  खुद  ही  के  ख़िलाफ़  ज़ेहाद  करते  हैं !
जीवन  निश्चित  है  फिर  मौत  भी  निश्चित , 
चलो , जी  चुके  गर  नफरत  से , तो  प्रेम  से  मरते  हैं !
किसी  ने  चुटिया  दी  लंबी ,
किसी  ने  टोपी ,
तो  किसी  ने पगड़ी !
याद  रखो , जरुर  बच्चे  ही  इक  दिन  पूछेगें ,
कि , इंसानों  का  वेश  क्यूँ  नहीं  दिया  ?? 







        






Sunday, July 7, 2013

तनु थदानी की कवितायें कायर नहीं हूँ मैं tanu thadani ki kavitaayen kaayar nahi hun main

रूप  बदलती  नायिका  ने, 
पूरी  कहानी  का  ही  रूप बदल डाला ,
मगर उसी  कहानी  में  अछूता  बचा  मैं !
मैं  खुद  अपनी  प्रेम- कथा  के  निर्वासन  का , 
बन  गया  इकलौता  गवाह  इस  पार !

नहीं   मानी  जायेगी  मेरी  गवाही ,
सभी  मेरी  प्रेम-कथा  को उपस्थित  मान  रहें  हैं !
कुछ  भी  तो  नहीं  बदलता  है ,
जब  साफ़- सुथरे  शरीर  की  आत्मा  मैली  हो  जाती  है ,
मुस्कानों  से  मासूमियत  खो  जाती  है !
मैं  अपनी  प्रेम- कथा  से  खुद  को  अलग  कर  रहा  हूँ ,
मगर  अलग  नहीं  कर  पाऊँगा  प्रेम  को !

विश्वासों  में   घातों  का  प्रचलन  क्यों  मान्य  है ?
विश्वास  हो  तो  हर  इक  मान्यता  रद्द   हो  जाती  है !

हे  ईश्वर !
तुझमे  बसा - रचा  मैं  ,
तुम  तक  लौट  आने  को  हूँ  तैयार  !
खारिज़  करता  हूँ  अपने  आवरण  को ,
कायर  नहीं  हूँ  मैं ,
देखो ! कैसे  कमल  बन  गया  मैं , तुम  पर  ही  अर्पित  होने  को , 
मगर  कीचड़  से  तो  नहीं  कर  सकता  प्यार  !!
   

Tuesday, May 21, 2013

तनु थदानी की कवितायें हमें लौटाने होंगे परियों के पंख tanu thadani ki kavitaayen


जब  सम्भोग  हमारे  प्रेम  का  परिचायक  बन  जाता  है ,
हम  वही  रहते  हैं ,
प्रेम  भी वही  रहता  है ,
मगर  दिल   से  इक  समुन्दर  बहता  है ,
जिसमे  नहा  कर  हमारा   वजूद   खारेपन  से   सन  जाता  है !

परियाँ   अलग   कहीं  नहीं  रहतीं ,
वो  हमारे  जेहन  में  रहतीं  हैं !
हमारी  सोच  में  मसली  जाती परियाँ ,
कराहती  हैं , छटपटाती  हैं ,
मत  काटो  हमारे  पंख  , बस  यही  कहतीं  हैं  !
आखिर  हमारे  ही  हाथों  से  किया  गया ,
हमारी   आँखों  को  नज़र  क्यूँ  नहीं  आता  है  ?

शरीर  लिपटता  है  शरीर  से ,
शरीर  के  साथ  शरीर  सोता  है ,
जब  हम  बिस्तर  पे  होते  हैं ,
तब  प्रेम  ज़मीन  पे  होता  है  !
अंततः  कहानी  ये  होती  है ,  कि ,
ना  हम  हो  पाते  हैं   सम ,
ना  दिल  कुछ  भी  भोग  पाता  है !

हमें  लौटाने  होंगे  परियों  के  पंख ,
तभी  वो  जेहन  से  निकल  हमारे  सामने  आयेंगी !
हमने  ही  प्रेम  को   सम्भोग  का  मोहताज   बनाया  है ,
सच  ये  है  की  , जीवन  की  तमाम  बारीकियों  को  मात  देता  प्रेम ,
हमारी  -  तुम्हारी  आँखों  से  ही  छन  जाता  है !!







     

Saturday, May 18, 2013

तनु थदानी की कवितायें , चलो पुराना संदूक खोलते हैं tanu thadani ki kavitaayen chlo puraana sanduk kholte hain


वो  तो   नींद  से  भी   लंबा  सपना  था ,
जिसमे  पिता  के  मुंह  पर ,
थूक  का  सैलाब  फैला  था ,
जिसमे  बेटी  पिता  की  गोद  में  जाने  से  कतराती  है ,
कि  , पिता  उसे  छूता  है  तो  उसे  डर  लगता  है , सहम  जाती  है !

नेपथ्य  में  असंख्य  पीड़ाओं  की  कथाएँ  हैं ,
मगर  आगे  नाटक  कुछ  और  चल  रहा  होता  है !
दर्शक  चुपचाप  बैठे  देखते  हैं ,
सुनते  हैं  पर  समझते   नहीं हैं ,
कि  खिलखिलाहट  के  शोरगुल  के  पीछे  भी  कोई  रोता  है ! 

जब  शर्म  एक  इतिहास  बन  जाती  है ,
तब  बेटियां  अपने  ही  घरों  में ,
अपने  कमरों  में  दरवाजे  की  छिटकनी  लगा  कर सोती हैं !
क्यूँ  हमने  सतह  छोड़  दी ?
क्यूँ  डूब  रहे  हैं  हम ??
ये  सैलाब  आया  कहाँ  से ???
ये  तो  आँसू  हैं  बेबसी  के ,
ध्यान  से  देखो -आज  पूरी  सदी  रोती  है  !!

चलो  पुराना  संदूक  खोलते  हैं ,
वही  पुरानी  किताब  निकालते  है,
पढ़ते  हैं  वही  कहानी  फिर  से ,
जिसमे  बेटियाँ  परियों  की  कहानियाँ  सुनती  हैं ,
पिता  की  बाहों  में  झूलती  हैं ,
बेधड़क  पिता  के  कन्धों  पे  चढ़  जातीं  हैं ,
फिर  गिरतीं  हैं - रोती  हैं 
सुबुकती  अनवरत  रोती  बिटिया  को  चुप  कराते - कराते ,
यकानक हँसते  हुये  पिता  की  आँखे  भर  आती  हैं  !!
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Friday, May 10, 2013

तनु थदानी की कवितायें - सोचों tanu thadani ki kavitaayen socho

हँसती  -  खेलती  - मुस्कुराती ,
चमकते  दांतों  वाली  लडकियां ,
हमारे  वजूद  का  हिस्सा  हैं  !

गुलाब  जामुन  में ,
ना  तो  गुलाब  होता  है 
ना  ही  जामुन ,
फिर  भी  मिठास  का  झोंका  है !
खाते  हम   सभी  हैं ,
मगर  दुष्प्रचार  करते  हैं  कि  नाम  में  धोखा   है !

हमारे  घरों  के  दालानों  में ,
छतों  पर  , खिड़कियों  पर ,
चहल- पहल  करतीं , हँसती  - खिलखिलाती  लड़कियां ,
वही  मिठास  हैं ,
जो गुलाब  औं  जामुन के नामों  में  गुम  हैं !
घर  की  दहलीज़  के  बाहर ,
इन्ही  मिठास  पर ,
जहरीली  चींटियाँ  बन  कर चिपकने  वाले ,
हम  और  तुम  हैं !

हमें  कभी  तो  दूसरों  के  बालों   का  स्टाईल  पसंद  नहीं  आता ,
कभी  दूसरों  का  चलना - फिरना , बातों  का  अंदाज़  नहीं  भाता !
हम  ना  तो  आईना  देखते  हैं ,
ना  ही  रखते  हैं ,
फिर  भी  खुद  को  समझदार  कहते  हैं  !

खुद  की  कुदृष्टि  खुद  पे  डालते  हैं ,
फिर  बड़ी  चालाकी  से  मानते  हैं ,
कि  ये  तो  हर  घर-घर  का किस्सा  है !!

सोचों  !
जिस  दिन  खो  जायेगी  मिठास ,
उस  दिन  ना  तो  गुलाब ,
ना  ही  जामुन ,
अपने  नामो  से पसंद  आयेगा ,
तुम  दूसरों  के  चेहरों  को  नापसंद  करते  हो  ना ?
तुम्हारा  भी  चेहरा एक  दिन  तुमको ,
बेखौफ   हो  कर  चिढ़ायेगा !!



 







Wednesday, May 1, 2013

तनु थदानी की कवितायें बेशक हम समझदार हैं tanu thadani ki kavitaayen beshak hum samjhdaar hain,

नहीं  था  कोई  विकल्प ,
सिवाय  चुप  रहने  के !

केवल  देखो  मेरे  जख्मों   को ,
ना  छूना - ना   बाँधना ,
सूखने   तक   खुला  रखुंगा  इसे ,  वरना  दर्द  बिखर  जायेगें  !

इतने  सारे  जख्म मेरे  वज़ूद  पर  आये  कैसे , मत  पूछना ,
ना  जाना  गहराइयों  में ,
मेरे  कुछ  अपनों  के  चेहरे  उतर  जायेंगे !

प्रेम  के  नाटक  में  मर गया  कलाकार ,
मगर  किरदार  ज़िंदा रहा !
वो  तो बहाना  था , कि  आँखों  में  कुछ गिर  गया ,
कारण  अनेक  थें  आंसुओं  के  बहने के ,
जो  हम  कभी  नहीं  बतायेंगे  !

दुनियादारी  की  आड़  में  छिपते  लोग ,
नहीं   बन  पाते  मित्र ,
मेरी  मानो ,  दुनियाँ  में  अपने  क़दमों  से  चलना ,
नहीं  तो ,
कंधों  पे  उठा  के  घुमाने  वाले ,
कहीं  भी  पटक  आयेंगे ,
दुनियाँ  ऐसे  ही चलती  है , पूरी  बेशर्मी   से  समझायेंगे !

बेशक  हम समझदार  हैं ,
पूरी  समझदारी  दूसरों  को  खुश  रखने  में  लगाते  हैं ,
कार्य  सिद्ध  नहीं  होने  पर नाराज हैं  होते ,
ऐसी  समझदारी के  साथ ,  हम  खुश  कैसे  रह  पायेंगे ?

चलो  !  खुश  रहने  के  लिये  कुछ  ऐसा  करते  हैं ,
दिल  पे  जख्म  देने  वालों  के नाम ,
दिल  में  दफ्न  करते  हैं !

कोई  लिखेगा  - कोई  बजायेगा - कोई  सुनेगा ,
तभी  तो  हम  गायेंगे ....
क्यूँ  न  यूँ  मिलें  सबों  से ,
ज्यों  कल  हम लौट  के  ना  आयेंगे  !!  









Tuesday, April 23, 2013

तनु थदानी की कवितायें जहरखुरानो से सावधान tanu thadani ki kavitaayen zaharkhuraano se saavdhaan

आत्मीयता  होती  है  जहर ,
जीवन   के सफ़र  के  दौरान ,
जहरखुरानो  से  सावधान !

बहुत  सारे  शब्दों  से  बनती  हैं  कहानियां ,
बहुत  सारी  कहानियां  निःशब्द  रह  जाती हैं ,
जिनकी  निःशब्दता  में   होता  है  ऐसा  समर्पण   ,
जो  पूरी  की  पूरी  कहानी  बयां  कर  जाती  है !

जीवन  के  सफ़र  में  नहीं   होनी चाहिये  आत्मीयता ,
होना  चाहिये  मात्र  समर्पण !

वैसे  भी आत्मीयता  दिखाने  की  चीज  होती  है ,
मगर  समर्पण  तो  करना  पड़ता  है !
समर्पण  सदैव  लबालब  है  रहता ,
आत्मीयता  में  बहुत  कुछ  भरना  पड़ता   है !

जहां  सब  हैं  खरीददार ,
सब  ही  हैं  दूकानदार ,
मानो  या  ना  मानो  आत्मीयता की  है  दूकान !
आना - जाना -देखना - छूना ,
मगर  जहरखुरानो  से  सावधान !!   

Wednesday, March 20, 2013

तनु थदानी की कवितायें रुको tanu thadani ki kavitaayen RUKO

जिसे  हम  बचपन   से  जानते  हैं ,
जो  हमारे   साथ  बड़ा  होता  है ,
यकानक  कुछ  ज्यादा  बड़ा  होने  का  प्रयत्न  करता  दीखता  है ,
मतलब  को  बांधता  है ,
और  बातों  में  फेंकता  है  !
जो  बचपन  से  पहचानता  है ,
तब  यकानक  अपरिचित  हो  जाता   है ,
कबाड़  सी  जिम्मेदारियों  में  जब  हमें  फंसा   देखता  है !

ऐसा  क्यूँ  होता  है ,
कि , हम  अचानक  ही  बच्चे  से  बड़े  हो  जाते  हैं !
सम्बन्ध  बैठ  जाते  हैं ,
हमारे  आजू - बाजू   पैसे  खड़े  हो  जाते  हैं !

सर्वप्रथम  घरों  में  कमरे  बाँटते   हैं ,
फिर  रसोई ,
अंततः  घर  बाँट  खुश  हैं  होते ,
जब  गाँव  में  खेतों  का  करते  हैं  हिस्सा ,
माँ  - बाबूजी   गठरियों  की  तरह  चुपचाप  रहते  हैं ,
लगता  ही  नहीं  की  वे  हैं  रोते ,
आँखों  के  गड्ढों  को  हाथों  से  पाटते  हैं !
हम , जो  अपनी  आँखों   का  पानी  तक  बेच  देते  हैं ,
सूखता  है  गला ,  तब  ओस  चाटते  हैं !

ऐसा  यूँ  होता  है ,
कि  परिणामों  के  मेले  में 
इकठ्ठे  घूमते  हैं ,
कपडे  खरीदने  के  लिये  शर्म  बेचते  हैं !
जीवन  का   व्याकरण  तो  यूँ  हैं  रटते ,   जैसे  आदमी  नहीं  तोते  हैं ,
हाथों  में  हाथ  होने  के  बावजूद  हम , अचानक  गुम  होते  हैं  !

रुको !
देखो  सूजन  आ  गयी  शक्ल  पे ,
बायें  हाथ  ने  अभी   कल ही तो  मारा  था ,
आज  दायाँ  हाथ  उसे  सेकता  है !
पैसा  तो  हमने  पैदा  किया  था ,
आज  पैसों  ने  हमें  ही  खरीद  लिया !

हम  बिक  चुके  हैं  फिर  भी  बचने  की  शुरुवात  करते  हैं ,
चलो  , अपने- अपने  अस्तित्व  से ,
सर्वप्रथम  अपना- अपना   मैं  काटते  हैं  !




















Monday, March 11, 2013

तनु थदानी की कवितायें -मैंने बांहें फैला दी है tanu thadani ki kavitaayen maine baanhey failaa di hain.



आओ , मैंने  पकड़   लिया   प्रेम   का एक  सिरा,
दूसरा  तुम  पकड़ो,
चलो , यादों  का  झूला  बनाया  है ,
तुम  झूलो  मेरे  साथ , मुझे  जोर  से   जकड़ो !

सातों  फेरों  में  था  एक  अनुबंध ,
एक  हिस्सेदारी  थी ,
मेरे  संपूर्ण  के  आधे  की !
लो , तुम  मेरा  आधा  नहीं  समूचा  हिस्सा ,
नहीं  चाहिये  एक  कण   भी  मुझे  मेरे हिस्से  का !
मेरे  लिये  केवल  तुम  ही  काफी  हो ,
केवल   और  केवल  तुम मेरे  हिस्से  में  आ  जाना !

सुनो , जलेबियाँ   सीधी    नहीं  होती ,
मगर  मीठी   तो  होती  हैं !
मैं  तो  मेहंदी  के  मानिंद  हूँ ,
हरे  से  लाल  होता  हूँ ,
आओ  ,खुशियाँ  फंसा  लो  , मैं  जाल  होता  हूँ !
वो  मेरा  सपना था  जो  टूट गया ,
पगली ,  तू  क्यों  रोती  है  ?

मैंने  बांहें  फैला  दी  हैं ,
जब  चाहो  आ  जाना ,
समा  जाना  मेरे  सीने  में , देना  हाथों  में  हाथ !
तुम्हारे  जिस्म  पे  शर्तों  के  आभूषण  चुभते  हैं ,
छिल  जायेगा  मेरा  सीना 
मुझे  नहीं  मंजूर  एक भी  खरोंच  मेरे  सीने   पर ,
क्यों  की  वहां  तुम  रहती  हो , मेरी  यादों  के  साथ  !!  




Sunday, March 3, 2013

तनु थदानी की कवितायें - अच्छा हुआ tanu thadani ki kavitaayen achchha hua

मैंने   तो  जीना  शुरू   ही   नहीं  किया  अब तक ,
क्यों  कि ,
जीने   के  लिये  तो   चाहिये   एक  अदद  जीवन  !

चरित्र   से  कुपोषित  चेहरों  पे ,
जीवन   की  नकाब  ओढ़े  जिंदगियों  ने 
सहमा  दिया  है !

नहीं  चाहिये  जीवन   ऐसे  माहौल  में ,
पूरा   का पूरा  खिलवाड़   है  ये जीवन  ,
बिलकुल  सही   बता रहा  हूँ  मैं !

साँसों   को   आपत्ति  नहीं    होती ,  तो,
मैं   हरगिज  जान  नहीं    पाता ,
कि  ये  जीवन  सारा  का  सारा ,
खिलवाड़  है    साँसों   के  साथ !

अच्छा   हुआ ,
मैंने   जीना   शुरू   ही   नहीं  किया  अब तक !!

Thursday, February 28, 2013

तनु थदानी की कवितायें - मैं तुमसे प्यार करता हूँ tanu thadani ki kavitaayen main tumse pyaar karta hun

मैं   नफरत  करता  था  तुमसे, 
मगर   गणित  के  किसी   भी  सूत्र    से ,साबित   नहीं  कर  पाया !
वफ़ा  के  घटने  के  बावजूद ,
सिद्ध  नहीं  कर  पाया  नफरत !

मगर 
बारहवीं  में  पढ़े  तर्कशास्त्र  ने 
आज  सिद्ध  करवाया  मुझसे 
कि  मैं  तुमसे  प्यार  करता  हूँ  !

हाँ !  ठीक   सुना  तुमने ,
मैं  तुमसे  प्यार  करता  हूँ ....
क्यों  कि  तुम  मेरी    माँ  से  प्यार  करती  हो,  
और  मैं   अपनी  माँ   से  प्यार  करता  हूँ , बहुत  प्यार  करता  हूँ  !
इसीलिये  स्वत :  सिद्ध  है 
कि  मैं  तुमसे  प्यार  करता  हूँ !!

Thursday, February 21, 2013

तनु थदानी की कवितायें - कब आओगी तुम tanu thadani ki kavitaayen kab aaogi tum

तुम   हमेशा  मेरी  नींद  में  प्रस्तावित  हो !
खुली  आँखों  में   तो  होते  हैं  हम ,
जिस्म   के पहरों  में ,
क्या  तुम   समझ   पा  रही  हो 
जिस्म   से परे  इश्क  को  ?
अगर  हाँ,  तो 
मैं  सिखाऊंगा  तुम्हे ,
दुःख  रहित  जीवन  जीने  का सलीका ,
जहां  हम  पूर्णत  वजूदहीन  हो  कर   करते  हैं  प्रेम ,
जहां   आनंद  के  लिये  वर्जित  होगा  जीना  ,
हाँ ! आनंद  से  जीने  के  लिये  आमंत्रित  होंगे  सब !

कब  आओगी  तुम  ?
चलो  छोड़ो ,
तुमने  तो  इर्द - गिर्द  बसाया  है  परिवार ,
जहां  तुम  सबो  के साथ ,
सब तुम्हारे  साथ ,
गुंथे  हुये  हैं अपनी - अपनी  जरूरतों  के  लिये !

आनंद  से  जीने  के  लिये  कोशिश  करती  हो ,
मगर  जी  नहीं  पाती  हो  ना ?
क्यों  तुमने  सात  फेरे  ले  कर ,
मुझे  इस्तेमाल  किया केवल  एक  रिश्ते  के  रूप  में ,
फिर  मुझे  दूरियों  के साथ  किया  अस्वीकार !

विश्वास  करो  मैं  दूर   जरुर  हूँ ,
मगर  मेरी  बाहों  के  घेरे  में ,
केवल  तुम  और  केवल  तुम  ही  पारित  हो !
आना  जरुर   मेरे सपनो  में  प्रिय ,
क्यों  कि  तुम  हमेशा  मेरी  नींद  में  प्रस्तावित   हो !








Monday, February 18, 2013

तनु थदानी की कवितायें - काश tanu thadani ki kavitaayen - kaash

मैं  शायद   नहीं रोता ,
अगर  किसी   ने  मेरा   हाल ना  पूछा  होता !

कुछ  टूटे- फूटे  सपनों   को  तकिया  बना  जागता  हूँ ,
किसी  की  नर्म  अँगुलियां ,
मेरे  बालों  को  सहलाती , तो  मैं  भी  सोता !

मेरी   नन्ही सी  जिन्दगी ,
मेरे  सीने  से  लिपट  फुसफुसाती  है ,
कि  , उसे  यहाँ  डर   लग  रहा है ,
जरुर  मेरा   घर  एक  जंगल  है ,
वरना  मैं  खुद   के  ही  घर  में   क्यूँ  यूँ  खोता ?

किसी  के  आगमन  पर ,
कोई  खामोशी   का  नगाड़ा   बजाता  है  भला ?    
भाव  तो  नग्न  कर  दिये  थे  अपनों  ने ,
किसी  ने  शब्दों  को   ही  कपडा  बनाया  होता  !

नहीं  समझेगा  कोई ,
कि  मैं  बातें  किससे  कर  रहा  हूँ ,
तुम  तो  मेरे अन्दर  हो ,
काश ! जमीन   मिल  जाती  मेरी  बिटिया ,
जहां  मैं  तुझे  बोता !!     





  

Friday, February 15, 2013

तनु थदानी की कवितायें -मूलतः ठग हैं हम tanu thadani ki kavitaayen - multah thag hain ham

अदभुत  शैली  के  ठग  हैं  हम ,
जो  सर्वप्रथम  स्वयं  को  ठगते  हैं !

योग्यता  के  बाजार   में  
खुद   को  बेच  कर   खुश  होना ,
गैर   जरुरी  मसौदों  को  
पूरे जीवन  सिर  पे   ढोना, 
किसी  जंगली  जानवर  के  लगभग  हैं  हम !
हम  जानते  हैं  कि  ठग   हैं  हम !!

अपने  बच्चों  के  समक्ष ,
चरित्रवान   होने  का  ढोंग  करते - करते
हम   ना  कभी  ऊबते   हैं  ,
ना  थकते   हैं ,
यूँ  ही  पीढ़ियों  से  
आदतन  ही  इक  दूसरे  को  ठगते  हैं !
जीवन  की  अंगूठी  में  ज्यों  नकली सा   नग  हैं  हम ! 
हम  खुश  हैं  कि  ठग  हैं  हम !!

रिश्तों   में  भी   लाभ- हानि   का  गणित  बैठाते  हैं ,
बूढ़े   होते माँ  - बाप की  उपयोगिता  पर  दिमाग   लगाते है ,
दिमाग  की  दिल  से  सांठ - गांठ को रोकते   हर  पग हैं  हम !
क्यों  कि  मूलतः  ठग  हैं  हम !!

तनु थदानी की कवितायें - मैं नहीं हूँ पागल - tanu thadani ki kavitaayen main nahi hun paagal

कई   दिनों  से   देख  रहा  हूँ 
तुम  खोज    रही  हो  मुझे 
अपनी  पर्स  में !
टटोल   रही  हो  मुझे 
ए  टी  एम   कार्ड   में !
एक   बार   आलिंगन  में झांक   लिया  होता ,
शायद   मुझे  महसूस   कर  पाती !

ढ़ेर   सारी  शिकायतों  को  उढेल  कर   मुझमे 
एक  शिकायत   शेष   बता रही  हो  कि 
मैं  क्यों   बन  गया डस्टबीन  ?

सच   कहूँ  
मैं  तो  बनना   चाहता   था  गमला 
काश  !  एक   पौधा   फूलों  का  लगा  कर  देखा    होता मुझमे  !

मेरी   कल्पना  में 
तुम   होती  हो  एक   बहुत  बड़ा  समतल सा  खेत 
मैं   हल  सा  तुम  पर  चल  रहा   होता  हूँ -
सुन्दर- सुन्दर  फूलों  के  बगीचे  की   आशा में  !

यूँ    मत  हँसो  मुझ  पर 
मैं  नहीं  हूँ   पागल 
जिस  दिन  हो  जाउंगा   पागल 
 उस  दिन  रो  भी  नहीं  सकोगी तुम  !!




तनु थदानी की कवितायें - मुझे विश्वास है tanu thadani ki kavitaayen- mujhey vishwaas hai




हम  अपने   व्यक्तिगत  होते  परिचय   को 
मान  बैठते  है  उपलब्धि  !

बच्चे    के  जन्म  के   साथ  मिठाइयाँ   बांटने 
और   किसी  परिचित  की  मौत  पर   रो लेने  की  प्रक्रिया  से 
हम   खुद को   मानव  साबित   कर  बैठते  हैं  !
क्यों    नहीं  रोती  आँखे   अपरिचित  की  मौत  पर ?
क्यों   हमारे    खुश  होने  के  मापदंड   भी  पहले से  तय  होते  है  ??

ता  उम्र  बिखराते  चलते   हैं  सजीव- निर्जीव  संबंध  एवम  साधन 
नहीं  समेट    पाते  अंतत :  !  

चलो   प्रिय  !
दिमाग  की  दीवारों  को  खुरचें 
पूरा   मवाद   निकलने    तक  खुरचें 
मुझे   विश्वास   है 
पूरा  मवाद  निकलने  पर   ही हम  सामान्य  हो  पायेंगे 
और  सामान्य     होना  ही तो   होगी   हमारी  उपलब्धि  !  

तनु थदानी की कवितायें , तुम आना जरुर tanu thadani ki kavitaayen - tum aanaa jarur .




मेरी   आत्महत्या  में 
आमंत्रित   हो  तुम  
क्यों  कि 
मेरी  आत्महत्या  तो   विस्तार  है   तुमसे  नफरत  का !
तुम   आना   जरुर ,
तभी  तो  एक  बार 
मेरे  शरीर   से  मुझे  अलग   होते  महसूस  करोगी !

क्या    फर्क  पड़ेगा  तुम्हे 
मुझे  नहीं  मालूम 
पर   मैं  जरुर  मुक्त  हो  जाउंगा  नफरत   की कड़ियों  से !

क्यों    हम   जीते   हैं   प्रेम  के  लिये  ?
प्रेम   से  क्यों  नहीं  जी  पाते  ??
प्रेम  के  लिये   जीने  में  शामिल    होती है  जिद 
मगर  प्रेम  से  जीने  में   चाहिये  मात्र  समर्पण !

मैं   फिर  कभी नहीं  मिलुंगा 
ना   शरीर  से ,   ना   याद से   ,
छूट  जायेगी  तुम्हारे  इर्द- गिर्द 
मेरी  तड़प , मेरी टीस  ,एक ना उम्मीदगी  ,
साथ  में  अकेलेपन   का गहरा  समुन्दर  !

तुम  आना  जरुर  
मेरी   आत्महत्या  तो  एक  जश्न   होगी  
मेरी   आत्महत्या     में  मैं   तो  जीवित   रहूंगा 
मेरे  भीतर  केवल तुम  मरोगी  !