Tuesday, February 18, 2014

tanu thadani खुश मत होना सखी तनु थदानी


खुश मत होना सखी
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जब स्त्री सौंपती है अपनी देह ,
तो वो केवल देह ही नही सौंपती ,
वो सौंपती है अपना पूरा अस्तित्व ,
पूरा विश्वास ,
और समूचा प्यार !

ऐसा क्यूँ है होता ,
समुंदर मीठी नदी को समाहित कर के भी ,
हो नहीं पाता मीठा ,
अकड़ता , उफनता , शोर शराबे से लबालब ,
हर अदा है  , मगर मीठेपन से लाचार  !

केवल सात फेरों से ,
बंध  जाती है पूरी नदी ,
मगर नहीं बांध पाती वो समुंदर को ,
अपने संपूर्ण समर्पण से भी !
डूबती उतरती जा रही अनवरत ,
कई  सदियों से उसी समुंदर में ,
होती है विलीन  चुपचाप ,
क्यूँ हर बार उसी में है खो जाने को  तैयार  ?

रात के दरवाजे से जब दबे पांव भीतर आयेगी सुबह ,
खुश मत होना सखी ,
सुबह आते ही उस रात को खा जायेगी ,
पूरा बरामदा उसकी उल्टियों से भर जायेगा !
अजगर तो बस मुस्कुरायेगा ,
डरी सहमी गौरेया अपने ही घोंसले में ,
बच्चों को डैनों में  समेटे छटपटायेगी  !

कभी समुंदर  , कभी अजगर , केवल पात्र बदलेगा ,
किस्मत नहीं बदलेगी  , न नदी की न गौरेया की
किस्सा भी वही रहेगा हर बार  !!





Monday, February 17, 2014

tanu thadani फिर बताओ तनु थदानी





फिर बताओ
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हमारी तमीज को टटोलते वो लोग ,
रात का इंतजार बस इसलिए करते हैं ,
कि नंगापन उनका छिप जाये !

भेड़ियों ने नेलपालिश खरीदी ,
गधो ने पायजामे ,
हम दोनों घटनाओं पर  शोध  करते रहें ,
और पूरा घर भर गया बंदरो से ,
चकित हुँ कि अब ये कहाँ से आये ?

खटिया आज भी बाहर नहीं है चलन से ,
बस सोफे वालों ने ,
खड़ी कर दी है हमारी खटिया !
गरीब तो महज मुहावरे से चूक जाते हैं ,
खड़ी तो खटिया ही होतीं हैं ना ,
सोफे तो महज जाते हैं सरकाये !

बिक जाने दिये हमने सपने अपने ,
खुद ही बेचे तो मलाल कैसा ?
उन्हें तो चाहिए था पैसा ,
अनजाने ही अपनी आबरु बेच आये !
हम तो गिनने में रहें व्यस्त ,
कि हमने कितने कमाये !

उन्हें लगता ही नहीं कि  वो बे-ढंगे हैं ,
उन्हें कतई नहीं शर्म की वो  नंगे हैं ,
वो तो आदतों की तरह हममें बैठे हैं घुलमिल ,
फिर बताओ ,
क्यूँ हम काले चश्मे लगायें ??