मारो मत मन को अपने, जो ,
प्रमाण है तेरे जीवन का !
क्यों करना है ध्यान ?
ध्यान खाली कर देता है ,
तुम भरे गिलास सा लबालब,
जो छलक रहा , पल पल हिल हिल कर,
ये ध्यान सदा ही धोखे से,
गिलास से बदल तुम्हें,
खाली थाली कर देता है !
क्यूं मार रहे हर पल मन को ?
मन तुम में जीवन भरता है !
तुम जिंदा हो ,
तब ही तो,
ये मन कोलाहल करता है !
लोगों की बातें सुन लेना ,
अच्छी जो लगे वो चुन लेना ,
पर ध्यान रहे सुन कर,चुन कर,
करना केवल अपने मन का !
ये ध्यान तुम्हारा दोस्त नहीं ,
तुम से ही तुम को हर लेगा ,
इक खालीपन से भर देगा,
तुम को बस पत्थर कर देगा ,
अब सोचों पत्थर में भी कभी ,
प्रमाण है मिलता जीवन का ??
जो ध्यान के पंजों में फंसता ,
मरने से पहले मरता है ,
इक गूंज रखो भीतर अपने ,
ज्यों मन कोलाहल करता है !!
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