जहाँ प्रेम की परिभाषा में केवल बंधन नहीं,
बल्कि मुक्ति का विस्तार होता है,
वहाँ किसी के होने या न होने से
मन का आकाश छोटा नहीं पड़ता।
रिश्ते जब बोझ बन जाएं,
और हर मिलने के बाद,
साँसें कुछ और भारी लगने लगें,
तो समझना—
वह प्रेम की देहरी नहीं,
अहम् का कोई सूना गलियारा है।
छोड़ देना भी कभी,
अपने होने की सबसे बड़ी पुकार होती है।
जो तुम्हारा है,
वह तुम्हारी आँखें भिगोने नहीं आएगा,
वह तो तुम्हारे भीतर की हर उलझन को,
बिना कुछ कहे सुलझा जाएगा।
क्योंकि जो आत्मा के आर्तनाद को न सुन सके,
उसके साथ का हर क्षण,
स्वयं से एक लंबी और अनवरत हार है।
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