Wednesday, October 28, 2026

जो मन कोलाहल करता है

जो मन कोलाहल करता है ,
मत मारो मन को,
प्रमाण है जो तेरे जीवन का !

क्यों करना है ध्यान ?
ध्यान खाली कर देता है ,
तुम भरे गिलास सा लबालब,
जो छलक रहा , पल पल हिल हिल कर,
ये ध्यान सदा ही धोखे से,
गिलास से बदल तुम्हें,
खाली थाली कर देता है !

क्यूं  मार रहे हर पल मन को  ?
मन तुम में जीवन भरता है !
तुम जिंदा हो ,
तब ही तों,
ये मन कोलाहल करता है !

लोगों की बातें सुन लेना ,
अच्छी जो लगे वो चुन लेना ,
पर ध्यान रहे सुन कर,चुन कर,
करना केवल अपने मन का  !





Monday, October 26, 2026

हम सब यूं ही चुक जायेंगे

इक दिन जब हम चुक जायेंगे ,
सोचोगे क्या पागलपन था ,
नींद कूट कर ख्वाब निकाले ,
वक्त पीस कर ख्वाब सजाये ,
उमर जला कर ख्वाब पकाये ,
लेकिन दरक गये वो सारे ,
टूटे फूटे ख्वाब समेटे ,
घूर तुझे देखेंगे बेटे ,
अपनी इज्जत कांख दबाये ,
खुद से मिलोगे  नीचे बैठे ,
कदम तुम्हारे रूक जायेंगे,
हम बस यूं ही चुक जायेंगे  !

नाहक इतना अपनापन था ,
मत पूछो उन सब लम्हों की,
किस्त चुकाते बिना शिकायत ,
मुठ्ठी भर औकात में अपने ,
झोली भर के ख्वाब थे फेंटे  ,
अंत समय तक ख्वाब तुम्हारे ,
लेंगे कतई न तेरे बेटे ,
बेदर्दी से अंत समय में,
साथ ही तेरे फुक जायेंगे ,
हम सब यूं ही चुक जायेंगे !





जीवन में कुछ भी रहस्य नहीं है

जीवन में कुछ भी रहस्य नहीं है ,
न तो दुख का कोई रहस्य है ,
न ही  खुशियां हैं रहस्यमयी !
न हमारा जीना ,
न हमारा मरना !

बस हमें खुद को समझना है,
बस हमें खुद को समझाना है ,
हम केवल खुद ही के लिये हैं रहस्यमयी,
नहीं पता हमें ,
जीवन के रस को कैसे है पीना ,
जीवन है मिला तो क्या है करना !

हम तो मात्र जीने के लिये जीते हैं,
सांसों के अतिरिक्त कोई आधार नहीं है जीने का  !
मौत को अछूत समझते हैं 
सो मृत्यु संग व्यवहार नहीं है जीने का। !

विचारों की खेती में जिसने, खुद को बोया ,
मरने के बाद भी उसका अस्तित्व नहीं खोया ,
हमें केवल यही है पता,
कि जीने के बाद है , बस मरना !

हम प्रकृति के रहस्य को भेदने में मर खप जाते हैं ,
रहस्य जानना ही क्यों है, 
बता नहीं पाते हैं !

पैसे कमाते हैं,
उम्र गंवाते हैं,
जीने के फायदे से ज्यादा,
मरने के बाद के फायदे पर फिसले जाते हैं,
हमारी ये आदतें हैं रहस्यमयी ,
कि एक प्रथा बनायी है ,
जहां घोषित करते हैं ,
कि शांति स्थापित करने के लिये जरूरी है लड़ना !



Friday, October 23, 2026

ये कमाल है हमारे यहां

ये रिवाज है हमारे यहां , 
बच्चे कहानियां सुनते हैं , 
बूढ़े कहानियां सुनाते हैं , 
और जवान चुपचाप कहानियां बन जाते हैं !

ये समाज है हमारे यहां , 
लड़कियों को जिंदा रहने के लिये , 
चुपचाप रोज मरने की आदत सिखाई जाती है ! 

ये राज है हमारे यहां, 
कि राजनीति हमारे चरित्र का हिस्सा है, 
जहां अवाम से हम एक वोट बन जाते हैं, 
कानूनन हमें जातियों में काटा जाता है  , 
ऊंच नीच में बांटा जाता है, 
फिर हम सब एक हैं, ये बात बताई जाती है  ! 
इस तरह हम सब , 
बेवकूफ पेड़ की टहनियाँ बन जाते हैं  ! 

ये कमाल है हमारे यहां,
अयोग्यता योग्यता को मुंह चिढ़ाती है,
सरकारी नौकरियां दंगल का मैदान बन जाती है,
कौवे मोती चुगते हैं ,
वोट बनते हैं जातियों से छन-छन,
सरकारी नौकरी में आरक्षण ,
चलो उस जज को बताते हैं  ,
जिसे हम चुनते ही नहीं ,
वो भी तो चुपचाप काॅलेजियम प्रणाली से बन जाते हैं  ।
फिर भी हम अपने प्रजातंत्र पर इतराते हैं ।।

   

Monday, October 19, 2026

खुश मत होना

लड़ाई मेरी मेरे धैर्य से थी, तुमसे नहीं,
मगर हार गया मैं ,
तुम्हें लग रहा है तुमसे हार गया मैं,
सच तो ये है ,
तुमको हार गया मैं !

तुम्हारा इश्क अधीन है तुम्हारी काया के ,
सो ढल रहा साथ तुम्हारे !
मेरा इश्क  अधीन है  मेरी छाया के  ,
उम्र दिखेगी ही नहीं किसी किनारे !

किसी दिन सो के उठोगी तुम,
मगर मैं नहीं उठूंगा,
अपनी जीत का जश्न तब मनाना ही पड़ेगा तुम्हें  !
रोना चाहो या न चाहो,
रो के दिखाना ही पड़ेगा तुम्हें !

तब मुकाबला तुम्हारा ,
सुख से होगा तुम्हारे ,
हार गयी तो सब पूछेंगे अब क्या करोगी,
खुश मत होना,
जीत के गड्ढे में तो अकेली ही गिरोगी  !

सुख हो या खुशी या जीत ही क्यों न हो 
सब नज़र आयेंगे 
पकड़ने जाओगी,हाथ नहीं आयेंगे !

हमारा प्रेम नहीं मरेगा,
वो चला जायेगा साथ मेरे ही,
देखना जब भी उस पार गया मैं !




















Wednesday, September 16, 2026

जूता मेरा है फटा


जूता मेरा है फटा ,
और मैं दोष दे रहा हूं ,
उस जमीन को जो चुभ रही है !
भीग रहा हूं,
बारिश को गलत बता रहा हूं ,
जब कि गलती ,
केवल और केवल मेरी है,
मेरे पास एक छाता भी नहीं है!

हमारी अयोग्यता हम ही नहीं देख पाते,
ना ही अपनी क्षमताओं को खुद तक लाते,
बे वजह ही हम इंसान हैं,
बड़ी लाचारी में ये बातें खुद से खुद को कही है !

पचास साल की बहू ,
अस्सी साल की सास के मरने की कामना करती है,
पढ़ी लिखी है पैसा है,
चेहरा भी गोरा है,
फिर दिल क्यों आदमखोर जैसा है ?
अगले साल खुद भी सास बनेगी ,
वो ये भी जानती है ,
फिर भी यही मानती है ,वो ही सही है !

हमारा जूता फटा होना ,
साथ में छाता न होना ,
हमारे बारे में सब बताता है ,
हमें अयोग्यता के मामले में ,
खुद का सक्षम होना सताता है !

हम अपने घर के गणित में ,
छोटी संख्या हैं ,
क्यों कोई पूछेगा कि हम क्या हैं ?
मां  चली जाती है इक दिन ,
बुढ़ापा फिर भी घर में रह जाता है ,
बस पात्र बदल जाता है ,
अगला चेहरा भी गोरा है ,
वो भी आदमखोर है ,
फिर शिकार होगा बुढ़ापा ,
शिकारी की पहचान हो चुकी है ,
हम चाहे या न चाहे , नियति तो यही है !

Friday, August 21, 2026

सब छूटेगें धीरे धीरे,

स्वागत है आपका 
मेरी शब्दों की यात्रा में, 
इन्हें पढ़ना नहीं महसूस करना, 
जिंदगी में अपने प्रिय के चेहरे की मुस्कान की तरह! 

नहीं मिलेगा फिर कोई जन्म, 
ना ही कोई दुनियाँ, 
अगर  खो गया तुम्हारे प्रिय का चेहरा , 
तो मानों अनंत काल  के लिये खो गया , 
यादों की भठ्ठी में जा सो गया एक ध्यान की तरह! 

हमारा रूप, हमारा नाम सब ही वजनहीन हैं, 
वजन केवल आज में है, 
कल तो निश्चित है ही नहीं, 
सो जितना आनंद समेट सको समेट लो, 
आज की खुशी को आज ही महसूस करो, 
अपने प्रिय के दायरे को अपना लो पूरे जहान की तरह  ! 

किसी के झांसे में न आना, 
कोई ज्ञान न अपनाना, 
सब छूटेगें धीरे धीरे, 
कोई शिकन माथे मत लाना, 
तुम तो खुद से भी छूटोगे धीरे धीरे, 
धीरे धीरे समझ ही लोगे , 
किसी का आना किसी का जाना, 
बस खुद से बिछड़ने से पूर्व, 
प्रियजनों की आंखों में घुल जाना, 
फिर नजर भी आओगे, 
छिपाये भी जाओगे, 
तिजोरी में रखे सामान की तरह  !