Tuesday, November 3, 2026

मौन

आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे मौन से मिलवाता हूँ, 
मौन की महायात्रा में, 
तुम बनना केवल यात्री, 
वरना लोग तो केवल मौन को ढ़ोते हैं  ! 

तुम्हारा मौन कभी भी तुम्हें धोखा नहीं देगा, 
तुम जितने लोगों की बातें सुनते हो, 
तुम जितने लोगों को जवाब देते हो, 
गौर करना, 
आधे से अधिक गैर जरूरी होते हैं  ! 

बोलने की कला एक विषय है, 
पढ़ने का, पढ़ाने का, कमाने का , 
मौन तो एक परिणाम है , 
बोलने की कला में उतीर्ण हो जाने का  ! 

जिसने तुम्हारी बातें सुनी, 
वो कोई भी हो सकता है, 
जो तुम्हारे मौन को सुने , 
वो ही तुम्हारे अपने होते हैं  ! 

चलो, मैं तुम्हें तुम्हारे मौन के घर का पता बताता हूँ, 
तुम्हारा मौन, नहीं रहता साथ तुम्हारे, 
वो  रहता है, 
तुम्हारे जानने वालों के मष्तिष्क में, 
जहां वो तुम्हें सम्मान के साथ संजोते है  !! 




Saturday, October 31, 2026

प्रेम

जहाँ प्रेम की परिभाषा में केवल बंधन नहीं,

बल्कि मुक्ति का विस्तार होता है,

वहाँ किसी के होने या न होने से

मन का आकाश छोटा नहीं पड़ता।


​रिश्ते जब बोझ बन जाएं,

और हर मिलने के बाद,

साँसें कुछ और भारी लगने लगें,

तो समझना—

वह प्रेम की देहरी नहीं,

अहम् का कोई सूना गलियारा है।


​छोड़ देना भी कभी,

अपने होने की सबसे बड़ी पुकार होती है।

जो तुम्हारा है,

वह तुम्हारी आँखें भिगोने नहीं आएगा,

वह तो तुम्हारे भीतर की हर उलझन को,

बिना कुछ कहे सुलझा जाएगा।

​क्योंकि जो आत्मा के आर्तनाद को न सुन सके,

उसके साथ का हर क्षण,

स्वयं से एक लंबी और अनवरत हार है।

Friday, October 30, 2026

अक्सर ऐसा होता है

अक्सर ऐसा होता है, 
कि जिंदगी एक शतरंज बन के रह जाती है, 
जहां हर चाल के बाद, 
या राजा की तरह तन्हाई जीत जाती है, 
या तो कोई अपना छूट जाता है  ! 

इस धुंधले कैनवास पर बिखरे हैं, 
कुछ अनकहे किस्से, 
सोये हुए लम्हों की छांव, 
और बिखरी हुई यादों के हिस्से  ! 

शतरंज के गिरे हुए मोहरे, 
गवाही देते हैं, 
उस खेल की, 
जिसे जीतने की चाह में, 
हम अपनो को ही हार बैठे  ! 

तब सिर थामे बैठ जाते हैं, 
खामोश हो, 
भीतर का शोर, 
दूरी के समंदर पार गूंजता है, 
और वो, 
जो कभी पास हो कर भी धुंधला सा ख्वाब था, 
अब हवाओं में घुल चुका है, 
जैसे कोई मरने तक रूठ जाता है  ! 

नकाब पहने हुए चेहरे, 
बताते हैं इस दुनियाँ के फसाने, 
जहां हंसी के पीछे आंसुओं को, 
मुस्कान की खिड़कियों से चिपकी कराह को, 
सिर्फ सन्नाटा ही सुन पाता है  ! 



Thursday, October 29, 2026

जो मन कोलाहल करता है

जो मन कोलाहल करता है ,
मारो मत मन को अपने, जो ,
प्रमाण है तेरे जीवन का !

क्यों करना है ध्यान ?
ध्यान खाली कर देता है ,
तुम भरे गिलास सा लबालब,
जो छलक रहा , पल पल हिल हिल कर,
ये ध्यान सदा ही धोखे से,
गिलास से बदल तुम्हें,
खाली थाली कर देता है !

क्यूं  मार रहे हर पल मन को  ?
मन तुम में जीवन भरता है !
तुम जिंदा हो ,
तब ही तो,
ये मन कोलाहल करता है !

लोगों की बातें सुन लेना ,
अच्छी जो लगे वो चुन लेना ,
पर ध्यान रहे सुन कर,चुन कर,
करना केवल अपने मन का  !

ये ध्यान तुम्हारा दोस्त नहीं ,
तुम से ही तुम को हर लेगा ,
इक खालीपन से भर देगा,
तुम को बस पत्थर कर देगा ,
अब सोचों पत्थर में भी कभी ,
प्रमाण है मिलता जीवन का ??

जो ध्यान के पंजों में फंसता ,
मरने से पहले मरता है ,
इक गूंज रखो भीतर अपने ,
ज्यों मन कोलाहल करता है !!




Monday, October 26, 2026

हम सब यूं ही चुक जायेंगे

इक दिन जब हम चुक जायेंगे ,
सोचोगे क्या पागलपन था ,
नींद कूट कर ख्वाब निकाले ,
वक्त पीस कर ख्वाब सजाये ,
उमर जला कर ख्वाब पकाये ,
लेकिन दरक गये वो सारे ,
टूटे फूटे ख्वाब समेटे ,
घूर तुझे देखेंगे बेटे ,
अपनी इज्जत कांख दबाये ,
खुद से मिलोगे  नीचे बैठे ,
कदम तुम्हारे रूक जायेंगे,
हम बस यूं ही चुक जायेंगे  !

नाहक इतना अपनापन था ,
मत पूछो उन सब लम्हों की,
किस्त चुकाते बिना शिकायत ,
मुठ्ठी भर औकात में अपने ,
झोली भर के ख्वाब थे फेंटे  ,
अंत समय तक ख्वाब तुम्हारे ,
लेंगे कतई न तेरे बेटे ,
बेदर्दी से अंत समय में,
साथ ही तेरे फुक जायेंगे ,
हम सब यूं ही चुक जायेंगे !





जीवन में कुछ भी रहस्य नहीं है

जीवन में कुछ भी रहस्य नहीं है ,
न तो दुख का कोई रहस्य है ,
न ही  खुशियां हैं रहस्यमयी !
न हमारा जीना ,
न हमारा मरना !

बस हमें खुद को समझना है,
बस हमें खुद को समझाना है ,
हम केवल खुद ही के लिये हैं रहस्यमयी,
नहीं पता हमें ,
जीवन के रस को कैसे है पीना ,
जीवन है मिला तो क्या है करना !

हम तो मात्र जीने के लिये जीते हैं,
सांसों के अतिरिक्त कोई आधार नहीं है जीने का  !
मौत को अछूत समझते हैं 
सो मृत्यु संग व्यवहार नहीं है जीने का। !

विचारों की खेती में जिसने, खुद को बोया ,
मरने के बाद भी उसका अस्तित्व नहीं खोया ,
हमें केवल यही है पता,
कि जीने के बाद है , बस मरना !

हम प्रकृति के रहस्य को भेदने में मर खप जाते हैं ,
रहस्य जानना ही क्यों है, 
बता नहीं पाते हैं !

पैसे कमाते हैं,
उम्र गंवाते हैं,
जीने के फायदे से ज्यादा,
मरने के बाद के फायदे पर फिसले जाते हैं,
हमारी ये आदतें हैं रहस्यमयी ,
कि एक प्रथा बनायी है ,
जहां घोषित करते हैं ,
कि शांति स्थापित करने के लिये जरूरी है लड़ना !



Friday, October 23, 2026

ये कमाल है हमारे यहां

ये रिवाज है हमारे यहां , 
बच्चे कहानियां सुनते हैं , 
बूढ़े कहानियां सुनाते हैं , 
और जवान चुपचाप कहानियां बन जाते हैं !

ये समाज है हमारे यहां , 
लड़कियों को जिंदा रहने के लिये , 
चुपचाप रोज मरने की आदत सिखाई जाती है ! 

ये राज है हमारे यहां, 
कि राजनीति हमारे चरित्र का हिस्सा है, 
जहां अवाम से हम एक वोट बन जाते हैं, 
कानूनन हमें जातियों में काटा जाता है  , 
ऊंच नीच में बांटा जाता है, 
फिर हम सब एक हैं, ये बात बताई जाती है  ! 
इस तरह हम सब , 
बेवकूफ पेड़ की टहनियाँ बन जाते हैं  ! 

ये कमाल है हमारे यहां,
अयोग्यता योग्यता को मुंह चिढ़ाती है,
सरकारी नौकरियां दंगल का मैदान बन जाती है,
कौवे मोती चुगते हैं ,
वोट बनते हैं जातियों से छन-छन,
सरकारी नौकरी में आरक्षण ,
चलो उस जज को बताते हैं  ,
जिसे हम चुनते ही नहीं ,
वो भी तो चुपचाप काॅलेजियम प्रणाली से बन जाते हैं  ।
फिर भी हम अपने प्रजातंत्र पर इतराते हैं ।।