जूता मेरा है फटा ,
और मैं दोष दे रहा हूं ,
उस जमीन को जो चुभ रही है !
भीग रहा हूं,
बारिश को गलत बता रहा हूं ,
जब कि गलती ,
केवल और केवल मेरी है,
मेरे पास एक छाता भी नहीं है!
हमारी अयोग्यता हम ही नहीं देख पाते,
ना ही अपनी क्षमताओं को खुद तक लाते,
बे वजह ही हम इंसान हैं,
बड़ी लाचारी में ये बातें खुद से खुद को कही है !
पचास साल की बहू ,
अस्सी साल की सास के मरने की कामना करती है,
पढ़ी लिखी है पैसा है,
चेहरा भी गोरा है,
फिर दिल क्यों आदमखोर जैसा है ?
अगले साल खुद भी सास बनेगी ,
वो ये भी जानती है ,
फिर भी यही मानती है ,वो ही सही है !
हमारा जूता फटा होना ,
साथ में छाता न होना ,
हमारे बारे में सब बताता है ,
हमें अयोग्यता के मामले में ,
खुद का सक्षम होना सताता है !
हम अपने घर के गणित में ,
छोटी संख्या हैं ,
क्यों कोई पूछेगा कि हम क्या हैं ?
मां चली जाती है इक दिन ,
बुढ़ापा फिर भी घर में रह जाता है ,
बस पात्र बदल जाता है ,
अगला चेहरा भी गोरा है ,
वो भी आदमखोर है ,
फिर शिकार होगा बुढ़ापा ,
शिकारी की पहचान हो चुकी है ,
हम चाहे या न चाहे , नियति तो यही है !
