Wednesday, September 16, 2026

जूता मेरा है फटा


जूता मेरा है फटा ,
और मैं दोष दे रहा हूं ,
उस जमीन को जो चुभ रही है !
भीग रहा हूं,
बारिश को गलत बता रहा हूं ,
जब कि गलती ,
केवल और केवल मेरी है,
मेरे पास एक छाता भी नहीं है!

हमारी अयोग्यता हम ही नहीं देख पाते,
ना ही अपनी क्षमताओं को खुद तक लाते,
बे वजह ही हम इंसान हैं,
बड़ी लाचारी में ये बातें खुद से खुद को कही है !

पचास साल की बहू ,
अस्सी साल की सास के मरने की कामना करती है,
पढ़ी लिखी है पैसा है,
चेहरा भी गोरा है,
फिर दिल क्यों आदमखोर जैसा है ?
अगले साल खुद भी सास बनेगी ,
वो ये भी जानती है ,
फिर भी यही मानती है ,वो ही सही है !

हमारा जूता फटा होना ,
साथ में छाता न होना ,
हमारे बारे में सब बताता है ,
हमें अयोग्यता के मामले में ,
खुद का सक्षम होना सताता है !

हम अपने घर के गणित में ,
छोटी संख्या हैं ,
क्यों कोई पूछेगा कि हम क्या हैं ?
मां  चली जाती है इक दिन ,
बुढ़ापा फिर भी घर में रह जाता है ,
बस पात्र बदल जाता है ,
अगला चेहरा भी गोरा है ,
वो भी आदमखोर है ,
फिर शिकार होगा बुढ़ापा ,
शिकारी की पहचान हो चुकी है ,
हम चाहे या न चाहे , नियति तो यही है !

Friday, August 21, 2026

सब छूटेगें धीरे धीरे,

स्वागत है आपका 
मेरी शब्दों की यात्रा में, 
इन्हें पढ़ना नहीं महसूस करना, 
जिंदगी में अपने प्रिय के चेहरे की मुस्कान की तरह! 

नहीं मिलेगा फिर कोई जन्म, 
ना ही कोई दुनियाँ, 
अगर  खो गया तुम्हारे प्रिय का चेहरा , 
तो मानों अनंत काल  के लिये खो गया , 
यादों की भठ्ठी में जा सो गया एक ध्यान की तरह! 

हमारा रूप, हमारा नाम सब ही वजनहीन हैं, 
वजन केवल आज में है, 
कल तो निश्चित है ही नहीं, 
सो जितना आनंद समेट सको समेट लो, 
आज की खुशी को आज ही महसूस करो, 
अपने प्रिय के दायरे को अपना लो पूरे जहान की तरह  ! 

किसी के झांसे में न आना, 
कोई ज्ञान न अपनाना, 
सब छूटेगें धीरे धीरे, 
कोई शिकन माथे मत लाना, 
तुम तो खुद से भी छूटोगे धीरे धीरे, 
धीरे धीरे समझ ही लोगे , 
किसी का आना किसी का जाना, 
बस खुद से बिछड़ने से पूर्व, 
प्रियजनों की आंखों में घुल जाना, 
फिर नजर भी आओगे, 
छिपाये भी जाओगे, 
तिजोरी में रखे सामान की तरह  ! 







Thursday, August 6, 2026

ले आना

मेरे पास एक हाड़ मांस का चबूतरा है
मैं अटक गया हूँ यहाँ
तुम सबको भी यहाँ तक आना है, मेरे बच्चों  ! 
यहाँ अटकना है मेरी तरह
मेरे जाने से पहले, 
या मेरे जाने के बाद  ! 

ले आना, 
अपनी मुठ्ठियों में, जेबों में भर भर कर , 
तुम्हारी माँ ने जो सिलबट्टे पर पीस रखी थी, 
खुश्बू भरी यादें, 
मैंने टोकरी में भर रखें थे जो, 
तेरे बचपन के तुतलाते संवाद  ! 

अगर जीवन की दौड़ में, 
सांसो के शोर में, 
भूल गये जो ये सब लाना, 
व्यर्थ हो जायेगा पूरी तरह, 
तेरा जीवन निचोड़ कर  पैसे कमाना  ! 

उम्र के आखिरी पन्नों का ठोस कबाड़ है ये चबूतरा, 
हमारी इच्छाओं का अनचाहा भार है ये चबूतरा, 
मैं पहुँच चुका हूँ, 
मैं अटक चुका हूँ, 
मैं बिलकुल अकेला हूँ यहाँ, 
तेरे बच्चे भी तुझे यहाँ अकेला छोड़ेगें, 
कारणों में अपनी व्यस्तता जोड़ेगें  ! 

आना ,महसूस करना  बेबसी मेरी, 
मिलेगी चबूतरे पर चिपकी, 
आंसुओं से लथपथ, 
तुम्हारी 
किलकारियों के आकार की बूंदें, 
उसी के साथ लिपटी मेरी याद  !! 

Thursday, December 25, 2025

चहकेंगी मेरे घोंसले में भी चिड़िया




मेरी  हँसी में, 
ढ़ेर सारी हँसी है ,
फिर भी खुशी की एक घड़ी बाकी है !

मेरी खुशियों में, 
मैं हूँ , तुम हो , परिवार है पूरा ,
मगर हम में एक कड़ी बाकी है !

मैं हूँ पुरुष,
बेटा हूँ , पति हूँ , बहुत  कुछ हूँ ,
मगर पूरा नहीं मैं पुरुष ,
मेरे ख्वाबों  में नन्ही एक परी बाकी है !

एक स्वेटर सा बुना जाना तो जीवन नहीं ,
महज सांसो का आना जाना भी जीवन नहीं !
मेरे ख्वाबों से रिसता है एक जंगल,
जहाँ मचान हैं , झाड़ हैं , पूरी नोक वाले तिनके हैं ,
चुभते हैं ,
मगर अम्मा ने बताया था - घबराना भी जीवन नहीं !

मिला है जंगल तो घोंसला बनाऊंगा ,
चहकेंगी मेरे घोंसले में भी चिड़िया ,
अभी मेरे ख्वाबों की एक लड़ी बाकी है !!





मैं जब भी दर्द लिखुंगा


मैं  जब  भी  दर्द  लिखुंगा, 
नम  दीवार  लिखुंगा !

एक  झुलसी  वफा की शक्ल,
एक  सन्नाटा,
एक  तन्हाई,
फिर  तेरा  प्यार  लिखुंगा !

मैं  जब  भी  दर्द  लिखता  हूँ ,
मुझमें  मैं  खोता  है !
मैं  कतई  मैं  नहीं  होता ,
कईयों  के  आंसू  बटोर  कर,
मेरे  दिल  के  खुले  बरामदे  में ,
मेरा  सुकून  रोता  है !

मैंने  जब  भी  दर्द  लिखा है ,
एक  बिस्तर  लिखा  है !
नागफनियों  से  लथपथ  बिस्तर  पे ,
मैंने  इक इक  सांसे  खोई  हैं !
क्या  लिखा  देख  लिया  ,
क्यूँ  लिखा  , ये  न समझा  कोई  है !
कहीं  परोसा  गया  ,
कहीं  बजी  तालियाँ ,
कोई  शब्दों  पे फिदा  हुआ  ,
कोई  मेरी  शैली  पे !
हर  इक  ने  लिया  आनंद  ,
केवल  मेरी  माँ  रोई  है !!
--------------  तनु थदानी

धूप को तो आलिंगन में रखना था

तुम  तो   धूप   थी  जाड़े  की , 
जिसको  मैंने  प्यार  से , 
पकड़  रखा  था   अपनी दोनों  हथेलियों  के  बीच !

जो  हमसे  बड़े  थे , 
सभी  हँसे  थे , 
कि  धूप   तो  हथेलियों  में  भरी  नजर   आती  है, 
अंततः  फिसल   जाती  है !

नहीं  फिसली  धूप,
उम्र  की  गर्मियों  में , 
भरी  दोपहरी जब, 
हथेलियों  में  भरी  धूप  ने , 
जला  डाला  मुझे , 
तब लगा , 
नहीं  है   वो  मेरी धूप , 
ये  तो   कोई  और  है , 
फिर  कहाँ  गई  वो   मीठी  धूप ??

कोई  नहीं   रोया  की  धूप  की  मिठास   खो गई , 
गौर  से  देखा  जली   हथेलियों  को , 
जहां  धूप  से  चिपक  मेरी  मुस्कान  सो  गई !

सच  कहूँ , 
धूप   को  हथेलियों  में  पकड़ना   ही गलत  था , 
धूप   को  तो   आलिंगन  में  रखना  था , 
तभी  वो  मेरी   हो पाती , 
जिस  दिन  धूप   मेरी   हो  जाती , 
जलती तो  मेरे  ही  भीतर , 
पर  मुझे  न  जला  पाती !!
-----------  तनु थदानी

Wednesday, December 24, 2025

ऐ पानी

ऐ पानी !
तू मेरी आँखों में आता ;
मेरे खेतों में क्यूं नहीं आता ??
मेरे खेत गिरवी हैं रे !
मेरे कर्जों पे बरस जा ;
बहा दे मेरे कर्जों को
या डुबा दे उन खुदगर्जों को ;
जो मेरी भूख से आत्महत्या तक के सफर पर
चमकाते हैं राजनीति अपनी !

बेटे ने पढ़ाई छोड़ दी ,
पैसे नहीं भेज पाया ना !
मैं उसे समझाता हूँ ,
वो मुझे समझाता है !
मेरे दुखों को यूं सहलाता है ,
बताता है, पढ़ाई ही गलत है शहरों में बाबा !
सिखाते हैं कि एक आक्सीजन होता है ,
जिसके साथ हाईड्रोजन मिलाने से
पानी का निर्माण है होता ,
ये तो गलत है ना बाबा !
मरे बैलों की पथराई आँखों ने, 
शहर में ढूंढ कर मुझसे पूछा ,
गंर पानी ऐसे बनता है तो
सूखा कैसे है होता ??

ऐ पानी !
मेरे खेतों की फटी बिवाईयों से दोस्ती कर ना !
मेरे जवान बेटे की झुर्रियों पे, 
बस एक बूंद बरस जा !

बेटा बताता है, 
तू आजकल बोतलों में बंद है !
तू तो बिक गया रे !
क्यूं अब भी तू जीवन है कहलाता ?
अगर जल ही जीवन है तो
तू मेरे खेतों में क्यूं नहीं आता ??
------------------- तनु थदानी