Thursday, December 25, 2025

धूप को तो आलिंगन में रखना था

तुम  तो   धूप   थी  जाड़े  की , 
जिसको  मैंने  प्यार  से , 
पकड़  रखा  था   अपनी दोनों  हथेलियों  के  बीच !

जो  हमसे  बड़े  थे , 
सभी  हँसे  थे , 
कि  धूप   तो  हथेलियों  में  भरी  नजर   आती  है, 
अंततः  फिसल   जाती  है !

नहीं  फिसली  धूप,
उम्र  की  गर्मियों  में , 
भरी  दोपहरी जब, 
हथेलियों  में  भरी  धूप  ने , 
जला  डाला  मुझे , 
तब लगा , 
नहीं  है   वो  मेरी धूप , 
ये  तो   कोई  और  है , 
फिर  कहाँ  गई  वो   मीठी  धूप ??

कोई  नहीं   रोया  की  धूप  की  मिठास   खो गई , 
गौर  से  देखा  जली   हथेलियों  को , 
जहां  धूप  से  चिपक  मेरी  मुस्कान  सो  गई !

सच  कहूँ , 
धूप   को  हथेलियों  में  पकड़ना   ही गलत  था , 
धूप   को  तो   आलिंगन  में  रखना  था , 
तभी  वो  मेरी   हो पाती , 
जिस  दिन  धूप   मेरी   हो  जाती , 
जलती तो  मेरे  ही  भीतर , 
पर  मुझे  न  जला  पाती !!

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