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Saturday, October 18, 2025

हे ईश्वर

शातिर दिमाग से खेलते हैं
शातिर  दिमाग  से  खेलते  हैं ,
नादान   दिल  से  खेलते   हैं ,
बेवकूफ  शरीर  से  खेलते  हैं ,
हम  खुद  के  भीतर  भी, 
इन  तीनो  स्थितियों  को, 
अपनी  मृत्यु  तक  झेलते  है !


हम  नहीं  हैं  ,
किसी  भी  पशु  के  विकास - यात्रा  के  यात्री, 
हमने  खुद  के  भीतर   ,
पशुता का  विकास  किया  है !
बेहतर हैं  पशु  हमसे, 
कि स्पष्ट  है  उनका लक्ष्य -भोजन ,
मगर  हमारे  लक्ष्य तक  नहीं  हैं  निश्चित !

हम  कपड़े  ओढ़  कर  शर्मिन्दा  हैं ,
मृत  भावनाओं  के  साथ  ज़िंदा  हैं ,
भीड़  मे  अकेलेपन  के  साथ  हैं ,
अकेलेपन  में  यादों  से  खेलते  हैं !
मात्र  साँसों  से  दोस्ती  के  लिये ,
रोज नया  आवरण , खुद  के  ऊपर  बेलते  हैं !

हे  ईश्वर  !
क्यूँ  है  हमारी  जीवन - यात्रा   अनिश्चित  ?
क्यूँ   हमारे  साथ   चलती  एक  निन्दा  है ?
क्यूँ  हैं  बनाते खुद  के  भीतर  खाई  अहंकार  की ?
आखिर क्यूँ  खुद  ही  को  उसके  भीतर  ढकेलते  हैं ??
-----------------------------  तनु थदानी