सोचोगे क्या पागलपन था ,
नींद कूट कर ख्वाब निकाले ,
वक्त पीस कर ख्वाब सजाये ,
उमर जला कर ख्वाब पकाये ,
लेकिन दरक गये वो सारे ,
टूटे फूटे ख्वाब समेटे ,
घूर तुझे देखेंगे बेटे ,
अपनी इज्जत कांख दबाये ,
खुद से मिलोगे नीचे बैठे ,
कदम तुम्हारे रूक जायेंगे,
हम बस यूं ही चुक जायेंगे !
नाहक इतना अपनापन था ,
मत पूछो उन सब लम्हों की,
किस्त चुकाते बिना शिकायत ,
मुठ्ठी भर औकात में अपने ,
झोली भर के ख्वाब थे फेंटे ,
अंत समय तक ख्वाब तुम्हारे ,
लेंगे कतई न तेरे बेटे ,
बेदर्दी से अंत समय में,
साथ ही तेरे फुक जायेंगे ,
हम सब यूं ही चुक जायेंगे !
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