कि जिंदगी एक शतरंज बन के रह जाती है,
जहां हर चाल के बाद,
या राजा की तरह तन्हाई जीत जाती है,
या तो कोई अपना छूट जाता है !
इस धुंधले कैनवास पर बिखरे हैं,
कुछ अनकहे किस्से,
सोये हुए लम्हों की छांव,
और बिखरी हुई यादों के हिस्से !
शतरंज के गिरे हुए मोहरे,
गवाही देते हैं,
उस खेल की,
जिसे जीतने की चाह में,
हम अपनो को ही हार बैठे !
तब सिर थामे बैठ जाते हैं,
खामोश हो,
भीतर का शोर,
दूरी के समंदर पार गूंजता है,
और वो,
जो कभी पास हो कर भी धुंधला सा ख्वाब था,
अब हवाओं में घुल चुका है,
जैसे कोई मरने तक रूठ जाता है !
नकाब पहने हुए चेहरे,
बताते हैं इस दुनियाँ के फसाने,
जहां हंसी के पीछे आंसुओं को,
मुस्कान की खिड़कियों से चिपकी कराह को,
सिर्फ सन्नाटा ही सुन पाता है !
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