मौन की महायात्रा में,
तुम बनना केवल यात्री,
वरना लोग तो केवल मौन को ढ़ोते हैं !
तुम्हारा मौन कभी भी तुम्हें धोखा नहीं देगा,
तुम जितने लोगों की बातें सुनते हो,
तुम जितने लोगों को जवाब देते हो,
गौर करना,
आधे से अधिक गैर जरूरी होते हैं !
बोलने की कला एक विषय है,
पढ़ने का, पढ़ाने का, कमाने का ,
मौन तो एक परिणाम है ,
बोलने की कला में उतीर्ण हो जाने का !
जिसने तुम्हारी बातें सुनी,
वो कोई भी हो सकता है,
जो तुम्हारे मौन को सुने ,
वो ही तुम्हारे अपने होते हैं !
चलो, मैं तुम्हें तुम्हारे मौन के घर का पता बताता हूँ,
तुम्हारा मौन, नहीं रहता साथ तुम्हारे,
वो रहता है,
तुम्हारे जानने वालों के मष्तिष्क में,
जहां वो तुम्हें सम्मान के साथ संजोते है !!
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