अदभुत शैली के ठग हैं हम ,
जो सर्वप्रथम स्वयं को ठगते हैं !
जो सर्वप्रथम स्वयं को ठगते हैं !
योग्यता के बाजार में ,
खुद को बेच कर खुश होना ,
गैर जरुरी मसौदों को ,
पूरे जीवन सिर पे ढोना,
किसी जंगली जानवर के लगभग हैं हम !
हम जानते हैं कि ठग हैं हम !!
अपने बच्चों के समक्ष ,
चरित्रवान होने का ढोंग करते - करते,
हम ना कभी ऊबते हैं ,
ना थकते हैं ,
यूँ ही पीढ़ियों से ,
आदतन ही इक दूसरे को ठगते हैं !
जीवन की अंगूठी में ज्यों नकली सा नग हैं हम !
हम खुश हैं कि ठग हैं हम !!
रिश्तों में भी लाभ- हानि का गणित बैठाते हैं ,
बूढ़े होते माँ -बाप की उपयोगिता पर,
दिमाग लगाते हैं,
दिमाग की दिल से सांठ - गांठ को रोकते ,
हर पग हैं हम !
क्यों कि मूलतः ठग हैं हम !!
क्यों कि मूलतः ठग हैं हम !!
---------------------- तनु थदानी
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