आज सुबह से ही परेशान हूँ मैं ,
अपनी अजन्मी कविता में बिंब को ले कर !
पुरानी चप्पलों को बिंब बनाया नेताओं का ,
घूर पड़ी सारी पुरानी चप्पलें घर की -
क्या तकलीफ दी हमने आपके पैरों को ??
बूढी हैं , पुरानी हैं , मगर काटती तो नहीं हैं आपको !
खोटे सिक्कों को टटोला ,
खनक पड़ें ,
बोले - मत बनाना हमें बिंब इन नेताओं का ,
हमारा यूँ तो कोई मोल नहीं ,
मगर वज़न कर के बेचोगे ,
तो इन नेताओं से अधिक ही पाओगे !
यहाँ तक की रद्दी अखबारों ने भी मना किया मुझे
कहा- नाम रद्दी है हमारा ,
खबरदार ! जो नेताओं से तुलना की,
हम बिकते जरुर है मगर राष्ट्र -हित में ,
वापस आतें हैं नए रूप में !
घर के कुत्ते ने मासूमियत से कहा -
हमने तो आपका नमक खाया है मालिक,
नहीं बनाना बिंब हमें नेताओं का ,
हमने कभी कोई नहीं की गद्दारी ,
युगों का देख लो इतिहास,
हमनें वफादारी में कभी कोई झोल नहीं डाला ,
अगर हमारे जैसे भी होते ये नेता ,
तो घुस नहीं पाता हमारे घर में,
कोयला, सत्यम, अगस्ता घोटाला !!
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