Friday, October 17, 2025

बिंब

आज  सुबह   से  ही  परेशान   हूँ  मैं ,
अपनी  अजन्मी  कविता में  बिंब को ले कर !

पुरानी  चप्पलों  को  बिंब   बनाया  नेताओं  का , 
घूर  पड़ी  सारी  पुरानी   चप्पलें  घर  की -
क्या   तकलीफ   दी  हमने   आपके  पैरों  को  ??
बूढी  हैं , पुरानी  हैं , मगर  काटती  तो नहीं हैं आपको !

खोटे  सिक्कों  को  टटोला , 
खनक  पड़ें , 
बोले - मत  बनाना  हमें  बिंब   इन  नेताओं  का , 
हमारा  यूँ  तो  कोई  मोल  नहीं , 
मगर  वज़न  कर  के  बेचोगे  ,
तो  इन  नेताओं  से  अधिक   ही पाओगे !

यहाँ  तक  की  रद्दी  अखबारों  ने  भी मना  किया मुझे 
कहा- नाम  रद्दी  है  हमारा , 
खबरदार ! जो नेताओं  से  तुलना  की,
हम  बिकते  जरुर  है  मगर  राष्ट्र -हित  में , 
वापस  आतें  हैं  नए  रूप  में !

घर  के  कुत्ते  ने  मासूमियत  से  कहा -
हमने  तो   आपका नमक   खाया  है  मालिक, 
नहीं  बनाना  बिंब   हमें  नेताओं  का  , 
हमने  कभी  कोई  नहीं  की  गद्दारी , 
युगों  का   देख  लो  इतिहास, 
हमनें  वफादारी  में कभी  कोई झोल नहीं डाला ,
अगर  हमारे  जैसे  भी  होते ये  नेता  , 
तो  घुस  नहीं  पाता  हमारे  घर  में, 
 कोयला, सत्यम, अगस्ता  घोटाला   !! 

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