कल घूमते -घूमते शहर के एक घर से जब बात हुई,
तो उसके बंद दरवाजे ने कुछ राज यूँ खोले -
चारपाई को ड्राईंग -रूम से हटा कर ,
पीछे बरामदे में रखना ,
उतना नहीं था दुखद उसके लिए ,
जितना दुखद था बाबूजी का ,
अब उस चारपाई पर,
बरामदे में सोना !
सुविधानुसार तर्क भी बनाये गये ,
घरवालों की तरफ से ,
कि ,
ड्राईंग - रूम के हो-हल्ले से उन्हें निजात मिली ,
वहीँ बरामदे में सटे बाथरूम होने से ,
उनकी दिनचर्या में सरलता आयी !
फिर उस दरवाजे ने ,
मेरे कान में धीमे से बताया -
बेटा बुरा नहीं है इतना,
वो तो बाबूजी ने खुद प्रस्ताव रखा था ,
नए सोफे की जगह बनाने हेतु !
बाजू वाले दरवाजे के बारे में बताया ,
उसके अन्दर कमरे तो हैं ,
मगर नहीं है बरामदा ,
सो उनके बाबूजी आश्रम में रहतें हैं !
बेटा उनका भी नहीं है बुरा ,
कितना ख्याल रखता है -
हर महीने मिलने जाता है,
मिलने वालों को बताता है -
घर पे तो कितने अकेले थे बाबूजी ,
वहाँ तो हमउम्र की अच्छी कंपनी मिल गई !
मगर अभी तक यकीन नहीं आया ,
कि उस बंद दरवाजे ने मुझे ये सब बताया ...
हे ईश्वर !
क्या मेरे बालों में आती सफेदी देख ली उसने ??
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