आमंत्रित हो तुम ,
क्यों कि ,
मेरी आत्महत्या तो विस्तार है तुमसे नफरत का !
तुम आना जरुर ,
तभी तो एक बार ,
मेरे शरीर से मुझे अलग होते महसूस करोगी !
क्या फर्क पड़ेगा तुम्हें,
मुझे नहीं मालूम ,
पर मैं जरुर मुक्त हो जाउंगा नफरत की कड़ियों से !
क्यों हम जीते हैं प्रेम के लिये ?
प्रेम से क्यों नहीं जी पाते ??
प्रेम के लिये जीने में शामिल होती है जिद ,
मगर प्रेम से जीने में चाहिये मात्र समर्पण !
मैं फिर कभी नहीं मिलुंगा ,
ना शरीर से , ना याद से ,
छूट जायेगी तुम्हारे इर्द- गिर्द
मेरी तड़प , मेरी टीस ,एक ना उम्मीदगी ,
साथ में अकेलेपन का गहरा समुन्दर !
तुम आना जरुर ,
मेरी आत्महत्या तो एक जश्न होगी ,
मेरी आत्महत्या में मैं तो जीवित रहूंगा ,
मेरे भीतर केवल तुम मरोगी !

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