Friday, October 17, 2025

ये मैं नहीं लिख रहा कविता


मेरे आंसुओं का खुशबू से तर हो जाना ;
नि:शब्दता को भींचना गले लगाना ;
जाहिर है तुमने कुंडी खटखटाई है ;
तुम्हारे साथ मेरी मुस्कान वापस आयी है !


नाहक पढ़ीं किताबें, 
कर डाले कागज़ काले ;
सीख न पाये दिल की भाषा पढ़ पाना  !
बहुत खोजा तेरे होने का मतलब ,
बीते कल को ढ़ोने का मतलब ;
मतलब का एक शहर समूचा ,
हाथ पकड़ना ; गुम हो जाना ;
फिर से तेरा लौट के आना ;
चुपचाप पड़े बिस्तर का गाना ;
जाहिर है हर सिलवट मुस्कायी है ;
सचमुच मेरी मुस्कान वापस आयी है !


देखो सागर का उछलना - मचलना ;
समझो उसका आनंदित हो जाना ;
जाहिर है उसमें नदी समायी है ;
ये मैं नहीं लिख रहा कविता, 
ये तो मेरी मुस्कान वापस आयी है !!
------------------- तनु थदानी

मेरा आमन्त्रण है तुम्हें




हे ईश्वर !

तुम्हारे  द्वारा  दिया गया   आँखों   का  पानी ,
कभी  नहीं  बहाया  मैंने  आंसू   बना कर ,
सुरक्षित  रखा इक  शर्म   के लिए  मात्र  !

हे  ईश्वर !
मैं   सच  कहता हूँ , 
हर   घर से  विसर्जित  होती  नालियों  में , 
मैंने  वो  ही पानी   देखा , 
अन्दर हर  घर  के  उस  शर्म  को  बेशर्म   होते देखा !

काश !
मैं  तुम्हारे  लिए  खुद  को  सुरक्षित  रख  पाता !
जैसा    तुमने   भेजा  था  निर्मल  और  स्वच्छ ,
वैसा  तुम  तक लौट  पाता  ....................

हाँ !
मैं   केवल  तुम्हारा  आलिंगन  चाहता  हूँ ,
मगर   अभी  नहीं !
मुझे  अपने  ऊपर  लगाए   ,
तमाम  कीचड़   साफ़  करने की  क्षमता  दो  ईश्वर ,
जिस -जिस  ने  भी मुझे  कीचड़  लगाया ,
उनके   हाथ भी  साफ़   करना ईश्वर ,
ताकि , 
जब भी  वो  तुमसे  क्षमा  मांगने हेतु  हाथ जोड़े ,
तो कम से कम हाथ  साफ़  व  स्वच्छ  हो  उनकें  !

मैं  नहीं  जानता , 
हे ईश्वर तुम्हारे  निराकार में   समाहित  आकार को ,
अगर जानता , 
तो  उस  आकार  में  तुम्हारी गोद  ख़ोज  लेता ,
जहां  मैं दुबक  कर -  सिमट कर बैठता ,
और  तुम्हारे हाथों का स्पर्श  सर पे महसूस  करता !!

तुम्हारे नाम से चलाते मजहबी दुकानदारों को, 
लड़ते  रक्त- रंजित  होते  देखा है अब तक ,
क्या ऐसा  संसार  मंजूर था तुम्हे ?
शायद नहीं ........
तभी तो  सर्वज्ञ  मानने  के  बावजूद  ,
ये भी   जानते हैं ,
कि  तुम हो  ही  नहीं   इस संसार  में !
अगर  होते  तो ,
श्रृन्गारित   होती   हमारी आत्माएं   प्रेम से !!

हे  ईश्वर !
मेरा आमन्त्रण  है  तुम्हे -    
आओ  अपनी  बनाई  इस  दुनिया  में !
मगर   किसी  रूप  में  न  आना ,
ना ही  शब्दों  और  किताबों  में  आना ,
आना  तो  हमारी  आँखों  में  पानी  बन  कर  आना ,
जो  संभाल रखे  तुम्हे ,उसी का  हो  के रह जाना  !! 
----------------------------- तनु थदानी

क्या मैं बंधक हूँ

हे  ईश्वर !
मझे  नहीं  याद  मैं  अंतिम   बार   कब  था   रोया  ,
जन्म  के  समय ही  रोया  था  शायद , 
क्यों  कि , 
उस  वक्त   किसी ने   लगाया  होगा  मुझे  गले !

आज  मैं  पुन : चाहता  हूँ  रोना , 
मेरे पास नहीं   है कोई , 
जो लगाये   गले , 
बैठे  मेरे  पास , 
मेरे  बालों  को  सहलाए , 
पूरी  गृहस्थी  है , 
मगर  जीवन  की  हँसी   मुझ पर  हँसती  है !

हे ईश्वर !
क्या  मैं  बंधक  हूँ  खुद   के  शरीर  का ?
क्यूँ  न  लिपटता  मुझ से  कोई ??
दिल है  कि ,  है  इक  सन्नाटा ?
क्यूँ    ना  मेरी  आँखे  रोयी ??

हे  ईश्वर !
नहीं   आ  रहा याद  मैं  अंतिम  बार  कब  था  सोया ?
बस  इन्तजार  है   इक  जोड़ी  बाहों   का , 
मिल   जायेगी तो   लिपट  के सो  लुंगा , 
सोने  से  पहले  जी  भर के  रो  लुंगा  !
जब  आऊँगा  पास    तुम्हारे , 
तुम  मेरे  बालों  को  सहलाना , 
नहीं   भेजना  इस  हृदयहीन  दुनियाँ  में  वापस !
चाहता   हूँ  खुद   के   आकार को  खोना !    
जीवन  की  जटिलताओं  में , 
इक   कुटिल हँसी  तो मिल  भी   जाती है , 
नहीं   मिलता  है  अंततः  निश्चल  रोना !!
----------------- तनु थदानी

Monday, October 6, 2025

प्रेम में रखो केवल भावना

जुबां  से  दिल  और  दिमाग  की  दूरी  तो ,
होती  है  बराबर ,
लेकिन  जुबां  पर  क्यूँ  दिमाग  ही  सवार  होता  है ?
अगर  होता  जुबां  में  दिल ,
या  होती  दिल  में  जुबां , 
सच  कहता  हूँ , 
हम  भूल  जाते ,  कि ,
ग़लतफ़हमी  का  मतलब  क्या  होता  है !

जीना  तो  किसी  की  आँखों  में  जीना ,
पीना  तो  किसी  की  आँखों  से पीना ,
अंधकार  तो  सब  निगल  जाता  है , 
क्या  सूरज  ने  कभी  कुछ  छीना ?
सूरज  तो  सबको  बराबर  धूप  बाँटता  है , 
मिलेगी  तुझे  भी  तेरे  हिस्से  की  धूप , 
पगले  तू  क्यों  रोता  है ??

जिन - जिन  को  चाहिये  प्यार  के  बदले  प्यार , 
सब  वो  पश्चिम  जायें, 
जिन्हें  बदले  प्यार  के  कुछ  ना  चाहिये ,
मेरे  पीछे  पूरब  आयें !
रास्ता  दूर  है  मगर  मंजिल  मिलेगी , 
आशा  की  इक  किरण  भी  इधर  से  ही  खिलेगी ,
क्यों  कि  ये  निश्चित  है  कि ,
सूरज  का  उदय  पूरब  से  ही  हर  बार होता  है !

अगर  हम  जुबां  पे  राज  करें ,
तो  हम  जुबां  से  राज  करेंगे ! 
अगर  हाथ  ना  मिलायें ,
हम  केवल  दिल  मिलायें , 
तो  शातिर  दुखों  का  पर्दाफ़ाश  करेंगे !
अपनी  गर्दन  पे  केवल  अपना  सिर  रखो  ना , 
क्यूँ   दूसरों  के  सिर  को  बेकार  ढ़ोता  है  ??

प्रेम  को  परिभाषित  करने  में , 
केवल  उम्र  की  लकड़ियाँ  न  तोड़ो ,
केवल  और  केवल  प्रेम  करो , 
मगर  अपनी  भावुकता  तो  छोड़ो !
प्रेम  में  रखो  केवल  भावना , 
भावुकता में तो  केवल शब्दों का खिलवाड़ होता है !!
------------------- तनु थदानी

Monday, September 29, 2025

जहरखुरानो से सावधान !

आत्मीयता  होती  है  जहर ,
जीवन   के सफ़र  के  दौरान ,
जहरखुरानो  से  सावधान !

बहुत  सारे  शब्दों  से  बनती  हैं  कहानियां ,
बहुत  सारी  कहानियां  निःशब्द  रह  जाती हैं ,
जिनकी  निःशब्दता  में   होता  है  ऐसा  समर्पण   ,
जो  पूरी  की  पूरी  कहानी  बयां  कर  जाती  है !

जीवन  के  सफ़र  में नहीं  होनी चाहिये  आत्मीयता ,
होना  चाहिये  मात्र  समर्पण !

वैसे  भी आत्मीयता  दिखाने  की  चीज  होती  है ,
मगर  समर्पण  तो  करना  पड़ता  है !
समर्पण  सदैव  लबालब  है  रहता ,
आत्मीयता  में  बहुत  कुछ  भरना  पड़ता   है !

जहां  सब  हैं  खरीददार ,
सब  ही  हैं  दूकानदार ,
मानो  या  ना  मानो  आत्मीयता की  है  दूकान !
आना - जाना -देखना - छूना ,
मगर  जहरखुरानो  से  सावधान !!
------------------- तनु थदानी

Saturday, September 27, 2025

क्या आज भी प्रेम होता है ?

रोया मैं बिछड़ कर तुमसे ,
लगा धुल कर मेरी आंखों से,
जिंदगी फिसल गयी !
कुछ तो था मेरे भीतर सुलगता सा,
अरे ! क्या तुम थी ??
तभी तो मेरी मौत जल गयी !

प्रेम का अपना ही व्याकरण है होता ,
प्रेम का अपना ही शब्दकोष होता है ,
जब हम नहीं मानते उस शब्दकोष को ,
सरल सा प्रेम एक पेचीदेपन में खोता है !

जब मैं तुम्हारे भीतर चल रहा था ,
तुम चल  रही थी मेरे भीतर ,
पता  नहीं चलने दिया कमबख्त उम्र ने ,
कि कब कैसे तुम मेरी आदतों में ढल गयी !

जीवन की महफिलों में ,
हंसी में , मुस्कुराहट में ,
आलिंगन से ले कर नशीली चाहत में ,
वादों का खजाना मिला हर दामन में !
गठबंधनों के सैलाब में ,
घुल गयीं जिंदगीयां ,
सब मिला , बस प्रेम की कमी खल गयी !

क्या आज भी प्रेम होता है ?
आ जाओ फिर से ,
तुम आखरी साक्ष्य बनोगी प्रेम का ,
मेरे पास बची हैं कुछ सांसे , संभालो उसको ,
अनगिनत सांसे तो तुम्हें याद करते - करते ही निकल गयीं !
-----------------------  तनु थदानी

Thursday, February 8, 2018

मैं तो दलदल में भी बहता हूँ

मैंने अपनी कई खामोश रातें, 
कुकर में पकाई हैं !
सीटियाँ बजती हैं,
मैं सीटियों को सहता हूँ ,
सब खुश रहें घर में
महज़ इस बात की खातिर,
मैं दूर कमाने को अकेला रहता हूँ !

अपने आँसुओं को पत्थर बनते देखना ,
यही तो दिनचर्या है ,
वज़नहीन साँसों को अंदर बाहर फेंकना,
यही तो दिनचर्या है !
तुम बेशक दिनचर्या कहो,
मैं तो दलदल कहता हूँ,
इसी दलदल में मेरी जिन्दगी कसमसाई है !
लोग फंसते हैं दलदल में,
मैं तो दलदल में भी बहता हूँ ,
दूर बहुत दूर ,
खुद के साथ अकेला जो रहता हूँ !!