Wednesday, November 25, 2015

आ के घुल जाना मेरी हँसी में

मेरी मुस्कान की सरहदें, 
खुली हैं चारों दिशाओं से ;
मैं जब हँसु ; आ के घुल जाना मेरी हँसी में !

मैं दरवाजा खटखटाऊंगा ,
तुम दौड़ कर आओगी ,
खोलोगी दरवाजा ; मुझसे लिपट जाओगी ,
बिना ये देखे
 बिना ये परवाह किये
 कि कोई साथ भी है मेरे !
मैं बंध जाऊंगा तेरी बांहों से ,
पुरानी यादों में जा के ,मुस्कुराना, मेरी हँसी में !

दिल में दिमाग की घुसपैठ ,
मार डालती है प्यार के ख्वाबों को !
देर तलक छानना अपने ख्वाब,
हकीकत के टुकड़े छनेंगे जरूर ,
जिन्दा ख्वाबों का अंतिम पड़ाव ,
मिलता है प्यार की राहों से,
आना खुद को भी भूल जाना मेरी हँसी में !

सपाट सी जिंदगी को खोदना ,
होठों पे मुस्कान गोदना  ;
तब नहीं बोलते हम
 जब बातें करती हमारी सांस है,
ये ही हमारे तुम्हारे होने का सारांश है ;
जो जाहिर हो जाते हैं निगाहों से ;
बेशक रूठना,
बेशक छिपना ,
मगर लौट आना मेरी हँसी में !
मैं जब जब हँसु ;आ के घुल जाना मेरी हँसी में !!

हम और तुम

फिर मिलेंगे, 
कहते हैं विदा होने से पहले, 
कितने आशावान हैं हम और तुम !

बेवकूफियों के अस्तर लगी जिंदगी जीते हैं ;
कल का नहीं पता, 
मगर अगले कई सालों की रूपरेखा में हैं उलझे ;
हरे से लाल हैं होते, 
कि जैसे पान हैं हम और तुम !

हमारे जिस्म के भूगोल का, 
इतिहास बनने का गणित , 
पूरा दर्शन शास्त्र है !
घड़ियां तो आईना होती हैं, 
टिक टिक कह कह, 
नहीं टिकती हैं खुद, 
न देती हैं टिकने ;
बताती हैं -
इसी परिपथ में घूमना ही जीवन मात्र है  !
तुम मुझमें, 
 मैं उतरता हूँ तुझमें, 
 खोजते हैं जीने को प्यार के पल ;
कैसे मान लू्ं कि मात्र सांसों की खान हैं हम और तुम !!

Wednesday, October 7, 2015

क्यूं हमें नींद नहीं आती ?

उफ् ! क्या ख़ूबसूरत है ये दुनियां ;
क्यूं ; हम नहीं बन पाते ख़ूबसूरत ?

दिल पहाड़ों सा बना लेते हैं पत्थर;
मगर ख़ूबसूरती पहाड़ों सी नहीं ला पाते ;
औक़ात पानी सी पतली लिये जीते हैं
निर्मलता पानी सी नहीं पा पाते !

माँ ने बच्चे को मार डाला, 
क्यों कि उसे प्रेमी चाहिए था !
ये कैसी परिभाषा गढ़ ली हमने प्रेम की ;
प्रेम के समर्थन में मुँह किया काला !
क्यूं हमें नींद नहीं आती ?
गंर आ भी जाये, 
तो सपने क्यूं नहीं आते ख़ूबसूरत ??

इच्छाएं हवा सी जीवंत हैं रखते,
मगर जीने नहीं देते दूसरों को !
नदी से बहते जीवन को नाला बना लेते,
पानी पीने नहीं देते दूसरों को !

हम अपने चहेतों की मुस्कान से, 
यूं भी खिलवाड़ कर लेते हैं ,
बाज़ार खिलौनों से पटा पड़ा है,
बच्चों को बंदूक खरीद देते हैं !
खिलौने तक नहीं खरीद पाते ख़ूबसूरत !!
क्यूं हम इस ख़ूबसूरत दुनियां के बाशिंदे ,
नहीं बन पाते ख़ूबसूरत ??

 

Saturday, August 22, 2015

चलो पत्र लिखे कृष्ण को

सुलगती लकड़ियों सा जीवन, 
तिल तिल मरती कराहती जिंदगियां ;
हतप्रभ हूँ देख, 
वृंदावन की हवा में, 
घुलती रोती प्यारी माँऐ !

छोड़ गये वही, 
जिन्हें सीने से लगा के पाला !
वृद्धा होना - विधवा होना -भूखो मरना
हर झुर्रियों से टपकती हैं, 
व्यथा की इक सी ही कथाऐं !

मेरी आंखें इकदम से हो गईं पत्थर, 
सूख गईं अचानक देख वृंदावन ;
कैसे रोयें ?
भला इतने आंसू वो कहाँ से लाये ??

दो पैरों की चलती फिरती लाशें, 
बूढ़ी काया वृंदावन में, 
अपनी ही सांसों से खुद को पिसती हैं ;
जब सुबुकती हैं तो आँसू नहीं रिसते ;
उन बेबस आँखों से, 
हमारी तुम्हारी माँ ही रिसती है !

चलो पत्र लिखे कृष्ण को, 
कि जीवन को जन्म देने वाली अभागिनों के हिस्से, 
दिया है अगर पीड़ा का दलदल, 
एक निवेदन है कि इनको, 
मौत की झपकी प्यार से आये !!
---------------------- तनु थदानी

Sunday, February 22, 2015

हम क्यूँ नहीं समझते ?

पूरी रात ही निचुड़ कर गिर पड़ी,
उजाले को धो कर निचोड़ा ही तो था !

जो  बावलें पत्थर की  ताकत, 
नापते हैं अपने सिर से, 
सलामत नहीं रह पाते !
इधर सिर ने आजमाया रिश्तों को, 
रहा सहा रिश्ता भी टूटा ,
बेशक वो थोड़ा  ही तो था !

सांसो के ताने बाने के बीचो बीच ही, 
है जीवन  का ठिकाना ,
मित्र ! झूठ फरेब के गाँव मिलेंगे ,
प्रपंचो की होगी खेती ,
आम की गुठली से आम ही होंगे ,
कतई झांसे में न आना !

वो हर एक अक्षर, 
जिससे बना सकते थे प्रेम के शब्द
तुमने ही विष पिरोया शब्दों में ,
उसका हर अक्षर कोरा  ही तो था !

संबंधो में दरार आये तो पाटना ,
विषबेल उगे तो काटना !
बूढ़ा बरगद हो या शाम की ढ़लती धूप ,
दोनों के साये में ही, 
सुकून है मीठा सा, 
कहीं मिल जाये तो बांटना !

रिश्तों में जुड़ाव हो कसाव नहीं, 
बात फकत इतनी सी ही, 
हम क्यूँ नहीं समझते ?
अरे ! ये गांठ कहाँ से आयी ??
हमने तो बंधन को कस के जोड़ा ही तो था !

Saturday, January 3, 2015

काश!

तारीखें पिघल जाती हैं ,
ओस अपनी मुठ्ठीयों में दबाती है एक सच, 
जिसे नहीं देख पाते हैं हम!

दो चोटियां करने वाली चुलबुली बहन ने, 
आज सालों बाद मांगी वो ही तारीखें, 
भाई उसकी उजड़ी मांग को हथेलियों से ढ़क कर, सहलाता है ,
सुबुकती आंखो को उससे छिपाता है,
काश! खरीद पाते पैसों से ओस की कुछ बूंदे ,
वो सुबह का लम्हा, 
वो तारीखें जो कभी पिघलती नहीं !

जिंदगी के दरवाजे पर सांकले नहीं होती,
हमें बस धकेलना है हथेलियों से अपनी ,
मैं दाखिल हो चुका हूं,
पुकारता हूं सब आओ ना !
 वो तिल तिल कर घुल रही है हवा में ,
कोई मेरी बहन को समझाओ ना !

Thursday, November 13, 2014

मैं तो अनपढ़ हूँ गांव का

दरक जाती है,
गुनगुनी सी मुस्कुराहट,
जब गौरेया बाज के पंजो में आती है !
टुथब्रश पर रखी जाती है पेस्ट की तरह,
फिर मटमैले पीले दाँतों पर मसली जाती है !
गांधी नोट से बाहर निकल नहीं रोयेगा ,
वैसे ही हँसता रहेगा ,
ये देख कर कि वो अंततः थूक दी जाती है !

किसी की चींख तब हकलाती  है ,
जब सुबकता है एक सपना ,
उस नन्ही बच्ची का ,
जिसका नाम तो कुछ भी हो सकता है ,
मगर पता, 
इस अंतरिक्ष में घूमते देश के एक गाँव का ही होता है ,
जहाँ मिड डे मील के साथ स्कूल है ,
नहीं आते मास्टर, 
गायें बंधती हैं सरपंच की वहाँ ,
पूरे सुकून से गांव का कुत्ता वहाँ सोता है !

ये हम कहाँ रह रहें हैं ?
माँ कहते हैं जमीन को ,
खरीदते हैं फिर बेच देते हैं !
बड़े कायदे से गर्म गोस्त को खाते हैं ,
हड्डीयाँ फेंक देते हैं !
वो मासूम बच्ची ,
वो गौरेया ,
क्यों केवल गोस्त का टुकड़ा नजर आती हैं  ?
तुम भले मत शर्मिंदा होना मेरे पढ़े लिखे दोस्तों ,
मैं तो अनपढ़ हूँ गांव का ,
ये कैसे देश में सांस  ले रहा हूँ ,
मुझे तो बेहद शर्म आती है !