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Wednesday, October 7, 2015

क्यूं हमें नींद नहीं आती ?

उफ् ! क्या ख़ूबसूरत है ये दुनियां ;
क्यूं ; हम नहीं बन पाते ख़ूबसूरत ?

दिल पहाड़ों सा बना लेते हैं पत्थर;
मगर ख़ूबसूरती पहाड़ों सी नहीं ला पाते ;
औक़ात पानी सी पतली लिये जीते हैं
निर्मलता पानी सी नहीं पा पाते !

माँ ने बच्चे को मार डाला, 
क्यों कि उसे प्रेमी चाहिए था !
ये कैसी परिभाषा गढ़ ली हमने प्रेम की ;
प्रेम के समर्थन में मुँह किया काला !
क्यूं हमें नींद नहीं आती ?
गंर आ भी जाये, 
तो सपने क्यूं नहीं आते ख़ूबसूरत ??

इच्छाएं हवा सी जीवंत हैं रखते,
मगर जीने नहीं देते दूसरों को !
नदी से बहते जीवन को नाला बना लेते,
पानी पीने नहीं देते दूसरों को !

हम अपने चहेतों की मुस्कान से, 
यूं भी खिलवाड़ कर लेते हैं ,
बाज़ार खिलौनों से पटा पड़ा है,
बच्चों को बंदूक खरीद देते हैं !
खिलौने तक नहीं खरीद पाते ख़ूबसूरत !!
क्यूं हम इस ख़ूबसूरत दुनियां के बाशिंदे ,
नहीं बन पाते ख़ूबसूरत ??