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Friday, October 17, 2025

मैं नहीं हूँ पागल

कई   दिनों  से   देख  रहा  हूँ , 
तुम  खोज    रही  हो  मुझे , 
अपनी  पर्स  में !
टटोल   रही  हो  मुझे , 
ए  टी  एम   कार्ड   में !
एक   बार   आलिंगन  में झांक   लिया  होता ,
शायद   मुझे  महसूस   कर  पाती !

ढ़ेर   सारी  शिकायतों  को  उढेल  कर  मुझ में , 
एक  शिकायत   शेष   बता रही  हो  कि , 
मैं  क्यों   बन  गया डस्टबीन  ?

सच   कहूँ  , 
मैं  तो  बनना   चाहता   था  गमला , 
काश  !  
एक पौधा  फूलों  का  लगा  कर  देखा  होता मुझमे !

मेरी   कल्पना  में , 
तुम   होती  हो  एक   बहुत  बड़ा  समतल सा  खेत , 
मैं   हल  सा  तुम  पर  चल  रहा   होता  हूँ -
सुन्दर- सुन्दर  फूलों  के  बगीचे  की   आशा में  !

यूँ    मत  हँसो  मुझ  पर , 
मैं  नहीं  हूँ   पागल , 
जिस  दिन  हो  जाउंगा   पागल , 
उस  दिन  रो  भी  नहीं  सकोगी तुम  !!