बहुत सारा सूनापन है मेरे पास,
ढ़ेर सारे सौतेले सपने भी हैं ;
कोई खुशबू थी मेरी आँखों में लबालब,
बह गयी डबडबा कर अभी अभी !
मेरी कवितायी भी ;
मेरे रोने का इंतजार करती है !
अगर ये ही जीवन है,
तो ; मैं जिन्दा क्यूं हूँ ??
वही प्रेम को जीता है,
जो प्रेम को पीता है !
हौले हौले आत्मा मरती है उसके जिस्म में ;
जान गया हूँ मगर आँखें बंद कर ली हैं !
गर कोई बेशर्म है,
तो ; मैं शर्मिंदा क्यूं हूँ ??
एक छत चार दीवारों के भीतर,
बेहद आहिस्ते से,
एक घर था बनाया ;
माँ साफ़ साफ़ देख सके,
सो एक ऐनक था लाया !
अब माँ से अपनी आँखें छिपाता हूँ ;
रोक नहीं पाता तो काला चश्मा लगाता हूँ!
मेरे पिंजरे ; तू तो सारी कहानी जानता है ना ;
मेरी माँ को मत बताना
कि मैं ; असहाय सा परिंदा क्यूं हूँ !!
------------------- तनु थदानी