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Sunday, December 27, 2015

मेरी माँ को मत बताना



बहुत सारा सूनापन है मेरे पास, 
ढ़ेर सारे सौतेले सपने भी हैं ;
कोई खुशबू थी मेरी आँखों में लबालब, 
बह गयी डबडबा कर अभी अभी !
मेरी कवितायी भी ;
मेरे रोने का इंतजार करती है !
अगर ये ही जीवन है, 
तो ; मैं जिन्दा क्यूं हूँ ??


वही प्रेम को जीता है, 
जो प्रेम को पीता है !
हौले हौले आत्मा मरती है उसके जिस्म में ;
जान गया हूँ मगर आँखें बंद कर ली हैं !
गर कोई बेशर्म है, 
तो ; मैं शर्मिंदा क्यूं हूँ ??

एक छत चार दीवारों के भीतर, 
बेहद आहिस्ते से, 
एक घर था बनाया ;
माँ साफ़ साफ़ देख सके, 
सो एक ऐनक था लाया !
अब माँ से अपनी आँखें छिपाता हूँ ;
रोक नहीं पाता तो काला चश्मा लगाता हूँ!
मेरे पिंजरे ; तू तो सारी कहानी जानता है ना ;
मेरी माँ को मत बताना
कि मैं ; असहाय सा परिंदा क्यूं हूँ !!
------------------- तनु थदानी