Tuesday, August 26, 2014

क्यूँ साबित करना पड़ता है प्रेम को ?

मैं जब भी लेता हूँ अपनी तलाशी ,
निकलती हो केवल तुम प्रिये ,
मेरी करवटों से ,
मेरी आदतों में ,
मेरी खामोशी तक से !
फिर क्यों नहीं लेती हो मान ये बात जरा सी ?

चलो खोदते हैं इक गढ्ढा ,
मेरे ही जिस्म में ,
मेरी ही साँसो के आस पास ,
बोते  हैं उसमें मेरी परछाई!
देखना !
फिर भी तुम ही खिलोगी अंततः मेरे अंतस से !
क्यों कि मैं तो खुद ही के जिस्म में हूँ अनिवासी !!

क्यूँ साबित करना पड़ता है प्रेम को ?
क्यूँ जिस्म,  आवेग को ही गवाही के लिये बुलाता है ??
इस सदी की बदनसीबी ही तो है ,
कि , सिकुड़ कर छोटा हुआ प्रेम ,
संभोग के चश्मे से ही नज़र आता है !

इक बार मेरी आत्मा में ,
समर्पण बो के देखना तुम अपना ,
उगेगा प्रेम ही मात्र!
जिस्म की सीढ़ियों से चढ़ कर ,
प्यार की ऊँचाईया ढ़ूंढ़ते लोगों में ,
मैं भी हो सकता हूँ एक पात्र,
जो पीता तो है अनवरत डूब कर ,
आत्मा फिर भी रह जाती है प्यासी !!

Monday, May 19, 2014

माँ जरुर हँसेगी


चलो ! एक समूची हँसी के लिये ,
मुस्कुराहट की किस्तें जमा करते हैं !

मगर करें कहाँ जमा ?

माँ का कमरा नम दिखता है ,
जरुर सोख लेगी नमी ,
हमारी मुस्कुराहट की पहली किस्त!

कतई नहीं पूछेगें माँ से कि नमी आती कहाँ से है !
पापा तस्वीरों में ही नहीं ,
हमारे दिलों में रहते हैं !
माँ ! देख हमारी मुस्कुराहटों में पापा हैं ना ?
पापा भी कभी  मरते हैं ??

पूरी दिनचर्या को सलीब सा माँ कंधों पे ढ़ोती है ,
माँ की चहल कदमी ,
एक एक पदचाप ,
पूरे घर में जब मौन लिखता है ,
सच कहूँ  , माँ का कमरा ही नहीं ,
पूरा घर नम दिखता है !
क्यूँ नहीं  देखा माँ को , कि माँ भी कभी रोती है !

परछाईयों ने जब्त कर ली है रौशनी ,
चलो ! परछाईयों के टुकड़े करते हैं!

रौशनी होगी तो देखेगी माँ हमारी मुस्कुराहट ,
रौशनी होगी तो माँ हँसी देखेगी हमारी ,
माँ  जरुर हँसेगी ,
चलो ! पूरे घर में रौशनी भरते हैं !!





Thursday, April 17, 2014

कुछ नहीं आयेगा हाथ तुम्हारे




कभी आना प्रिये मेरे घर भी ,
जहाँ मैं बिलकुल अकेला रहता हूँ साथ तुम्हारे !

मेरी अजन्मी बिटिया की चींखों से पटी दीवारें ,
ना छूना इन्हें ,
ये नम हैं आँसुओं से मेरी !

भीतर दालान में ,
उम्र की रस्सीयों पर सूख रहीं हैं यादें तुम्हारी !

आजकल मैंने दालान में बैठना ही बंद कर दिया !
तुम्हें मेरा जिस्म नजर आया ,
क्यूँ नजर न आयी  वो धुन ,
जो मेरी सांसो में किसी मासूम ने  छेड़ी !

नहीं रोक पाओगी ,
इक दिन यकायक ,
आ के मेरे सीने से लिपट जायेगी मेरी बिटिया !
तुम्हारी तमाम बंदिशों के बावजूद ,
वो शामिल होगी मेरी हंसी में इक दिन,
क्यूँ कि उसने मुझमें घुल के ,
कर ली है जीने की तैयारी !

कुछ नहीं आयेगा हाथ तुम्हारे ,
ना मैं , न मेरा जिस्म, ना रूह ही मेरी !!

Tuesday, February 18, 2014

खुश मत होना सखी

जब स्त्री सौंपती है अपनी देह ,
तो वो केवल देह ही नही सौंपती ,
वो सौंपती है अपना पूरा अस्तित्व ,
पूरा विश्वास ,
और समूचा प्यार !

ऐसा क्यूँ है होता ,
समुंदर मीठी नदी को समाहित कर के भी ,
हो नहीं पाता मीठा ,
अकड़ता , उफनता , शोर शराबे से लबालब ,
हर अदा है  , मगर मीठेपन से लाचार  !

केवल सात फेरों से ,
बंध  जाती है पूरी नदी ,
मगर नहीं बांध पाती वो समुंदर को ,
अपने संपूर्ण समर्पण से भी !
डूबती उतरती जा रही अनवरत ,
कई  सदियों से उसी समुंदर में ,
होती है विलीन  चुपचाप ,
क्यूँ हर बार उसी में है खो जाने को  तैयार  ?

रात के दरवाजे से जब दबे पांव भीतर आयेगी सुबह ,
खुश मत होना सखी ,
सुबह आते ही उस रात को खा जायेगी ,
पूरा बरामदा उसकी उल्टियों से भर जायेगा !
अजगर तो बस मुस्कुरायेगा ,
डरी सहमी गौरेया अपने ही घोंसले में ,
बच्चों को डैनों में  समेटे छटपटायेगी  !

कभी समुंदर  , कभी अजगर , केवल पात्र बदलेगा ,
किस्मत नहीं बदलेगी  , न नदी की न गौरेया की
किस्सा भी वही रहेगा हर बार  !!





Friday, January 10, 2014

आना मेरे गांव


धूप की टक्कर से लहुलुहान  अपाहिज छांव  !
नहीं है शहर  में तेरा कोई ,
आना मेरे गांव ,
आज भी मेरे गांव में ,
जब मरता है कोई ,
रोता है समूचा गाँव !
बचपन आज भी जीवित है यहाँ ,
आ के देखो तो सही ,
बारिशों में आज भी नजर आयेगी यहाँ कागज की नाव  !

आज भी मेरे गांव दादी दादा नजर आते हैं ,
आज भी जिंदा है यहाँ ननिहाल ,
पंक्षी कंधों पे बैठ इतराते हैं ,
मिल जाता परिंदा हर डाल  !

यहाँ हर तरफ परिवार ही परिवार ,
मत पूछो घर है कहाँ ??
देखो तो पूरा शहर घरों से पटा  पड़ा है ,
मगर परिवार लापता है  !
घूमता है पूरा शहर दिन भर इधर उधर ,
गन्तव्य है नहीं कहीं ,
फिर भी चलते क्यूँ हैं नहीं पता है  !

यहाँ गांव में धूप से नहीं होगी टक्कर ,
आ के देखो तो सही ,
वही धूप यहाँ सहलायेगी तेरे पांव  !!
----------------- तनु थदानी

Friday, December 27, 2013

एक बार तो कहना मुझे

आनंद को पाने के लिये ,
नाचते-गाते लोग ,
सहवास करते लोग ,
भजन -कीर्तनों में डूबते लोग ,
नहीं पाते होंगे आनंद,
एक बार कहना उन्हें ,
दूसरों को आनंद दे कर तो देखे इक बार!

जीने  के लिये ,
युद्ध सी दिनचर्या को लपेटे लोग ,
अक्ल से नंगे ,
घड़ी की सुइयों पे लेटे लोग ,
जी नहीं पाते अक्सर ,
जीवन जीने हेतु मरते-मारते हैं रहते,
एक बार  कहना उन्हें ,
दूसरों को  आराम से जीने तो दे एक बार!

कोई  शोध  नहीं करना ,
कोई  राजनीति नहीं करना ,
अगर  आनंद से जीना है तो ,
जीने का आनंद  लेते- लेते मरना !
एक बार तो कहना मुझे ,
कि तुम्हें जीना है आनंद से इस बार  !!

Saturday, May 18, 2013

चलो पुराना संदूक खोलते हैं


वो  तो   नींद  से  भी   लंबा  सपना  था ,
जिसमे  पिता  के  मुंह  पर ,
थूक  का  सैलाब  फैला  था ,
जिसमे  बेटी  पिता  की  गोद  में  जाने  से  कतराती  है ,
कि  , पिता  उसे  छूता  है  तो  उसे  डर  लगता  है , सहम  जाती  है !

नेपथ्य  में  असंख्य  पीड़ाओं  की  कथाएँ  हैं ,
मगर  आगे  नाटक  कुछ  और  चल  रहा  होता  है !
दर्शक  चुपचाप  बैठे  देखते  हैं ,
सुनते  हैं  पर  समझते   नहीं हैं ,
कि  खिलखिलाहट  के  शोरगुल  के  पीछे  भी  कोई  रोता  है ! 

जब  शर्म  एक  इतिहास  बन  जाती  है ,
तब  बेटियां  अपने  ही  घरों  में ,
अपने  कमरों  में  दरवाजे  की  छिटकनी  लगा  कर सोती हैं !
क्यूँ  हमने  सतह  छोड़  दी ?
क्यूँ  डूब  रहे  हैं  हम ??
ये  सैलाब  आया  कहाँ  से ???
ये  तो  आँसू  हैं  बेबसी  के ,
ध्यान  से  देखो -आज  पूरी  सदी  रोती  है  !!

चलो  पुराना  संदूक  खोलते  हैं ,
वही  पुरानी  किताब  निकालते  है,
पढ़ते  हैं  वही  कहानी  फिर  से ,
जिसमे  बेटियाँ  परियों  की  कहानियाँ  सुनती  हैं ,
पिता  की  बाहों  में  झूलती  हैं ,
बेधड़क  पिता  के  कन्धों  पे  चढ़  जातीं  हैं ,
फिर  गिरतीं  हैं - रोती  हैं , 
सुबुकती  अनवरत  रोती  बिटिया को चुप कराते-कराते ,
यकानक हँसते  हुये  पिता  की  आँखे  भर  आती  हैं  !!
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