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Tuesday, August 26, 2014

क्यूँ साबित करना पड़ता है प्रेम को ?

मैं जब भी लेता हूँ अपनी तलाशी ,
निकलती हो केवल तुम प्रिये ,
मेरी करवटों से ,
मेरी आदतों में ,
मेरी खामोशी तक से !
फिर क्यों नहीं लेती हो मान ये बात जरा सी ?

चलो खोदते हैं इक गढ्ढा ,
मेरे ही जिस्म में ,
मेरी ही साँसो के आस पास ,
बोते  हैं उसमें मेरी परछाई!
देखना !
फिर भी तुम ही खिलोगी अंततः मेरे अंतस से !
क्यों कि मैं तो खुद ही के जिस्म में हूँ अनिवासी !!

क्यूँ साबित करना पड़ता है प्रेम को ?
क्यूँ जिस्म,  आवेग को ही गवाही के लिये बुलाता है ??
इस सदी की बदनसीबी ही तो है ,
कि , सिकुड़ कर छोटा हुआ प्रेम ,
संभोग के चश्मे से ही नज़र आता है !

इक बार मेरी आत्मा में ,
समर्पण बो के देखना तुम अपना ,
उगेगा प्रेम ही मात्र!
जिस्म की सीढ़ियों से चढ़ कर ,
प्यार की ऊँचाईया ढ़ूंढ़ते लोगों में ,
मैं भी हो सकता हूँ एक पात्र,
जो पीता तो है अनवरत डूब कर ,
आत्मा फिर भी रह जाती है प्यासी !!