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Friday, October 17, 2025

है कहाँ प्रेम ??




मैं  प्रेम   की  कविता  नहीं  लिखुंगा  कभी ,
किसके  लिये लिखूं  ?
है  कहाँ  प्रेम  ??
हमारे  समाज में प्रेम  मात्र  कविता में बचा  रह  गया है !

अगर  न  रोने   का  वादा  करो  तो  मैं दिखाऊंगा तुम्हे , 
प्रेम  का क्षत - विक्षिप्त  शव  छपरा के  अस्पताल  में !
अभी  तक  मांओं  के  आंसुओ  के  निशान  ताजा  हैं ,
कभी  ना  रोने  वाला  पिता  भी है  बिलखता - रोता !
जारी  है  मौत  की  सरसराहट ,
एक   बिस्तर  से  दूसरे  बिस्तर ,
छटपटाती  मासूम  जिंदगियों  के  अगल - बगल !
क्या  प्रेम  है  बचा  हमारे  समाज  में ?
अगर  होता  तो  ये  दृश्य  ना  होता !!

नेताओं  की  खिली  बाँछों  में ,
राजनीति  से  प्रेम  नजर  आता  है !
उस  बनिये  का  पैसे  से  प्रेम  समझ  आता  है !
दलाल  दर  दलाल  कमीशन - प्रेम  मंडराता  है !
सभी व्यस्त हैं ,
अपने प्रेम की परिभाषा को चुस्त रखने में,
ये  भी  कोई  शोध  का  विषय  है ,
कि गाँव  का  बच्चा  मिड- डे  मील क्यों  खाता है ??  

प्रेम -रस  में  डूबे  शब्दों  के  लूटेरे ,
अध्यात्म  की  चाश्नी  बेचने  वाले  हजारो  डेरे ,
कितनी सहजता से आँखे  मूंद निकल गयें सुबह -सुबह, 
उन्हें  तो  प्राणायाम  करना  था  ना !!

मैं  प्रेम  के  जज्बातों  के  साथ  नहीं  दिखुंगा  कभी ,
किसके  लिये  दिखुं ?
है  कहाँ  प्रेम  ??


तुम  राजनीति  करते  लोग ,
प्रवचन  करते  लोग ,
व्यापार  करते  लोग 
सब  हो  हत्यारे  प्रेम  के !!
मैं  नहीं  कह  रहा  ये  सब ,
गौर  से  सुनना  आवाज  अभी  तक  गूंज  रही  है ,
प्रेम  से  वंचित  वो  गाँव  का  बच्चा , 
अस्पताल  में  मरने  से  पहले  कह  गया  है !!