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Friday, October 17, 2025

हमें लौटाने होंगे परियों के पंख


जब  सम्भोग  हमारे  प्रेम  का  परिचायक बन जाता है, 
हम  वही  रहते  हैं ,
प्रेम  भी वही  रहता  है ,
मगर  दिल   से  इक  समुन्दर  बहता  है ,
जिसमे  नहा  कर  , 
हमारा   वजूद   खारेपन  से   सन  जाता  है !

परियाँ   अलग   कहीं  नहीं  रहतीं ,
वो  हमारे  जेहन  में  रहतीं  हैं !
हमारी  सोच  में  मसली  जाती परियाँ ,
कराहती  हैं , छटपटाती  हैं ,
मत  काटो  हमारे  पंख  , बस  यही  कहतीं  हैं  !
आखिर  हमारे  ही  हाथों  से  किया  गया ,
हमारी   आँखों  को  नज़र  क्यूँ  नहीं  आता  है  ?

शरीर  लिपटता  है  शरीर  से ,
शरीर  के  साथ  शरीर  सोता  है ,
जब  हम  बिस्तर  पे  होते  हैं ,
तब  प्रेम  ज़मीन  पे  होता  है  !
अंततः  कहानी  ये  होती  है ,  कि ,
ना  हम  हो  पाते  हैं   सम ,
ना  दिल  कुछ  भी  भोग  पाता  है !

हमें  लौटाने  होंगे  परियों  के  पंख ,
तभी  वो  जेहन  से  निकल  हमारे  सामने  आयेंगी !
हमने  ही  प्रेम  को   सम्भोग  का  मोहताज   बनाया  है ,
सच  ये  है  की  , जीवन  की  तमाम  बारीकियों  को  मात  देता  प्रेम ,
हमारी  -  तुम्हारी  आँखों  से  ही  छन  जाता  है !!