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Friday, October 17, 2025

हम तो आखिर इंसान हैं ना




हम  प्यार  करना  क्यों  नहीं  सीख  पाते ?
गवां    देते  हैं  पूरी  उम्र ,
शादी  करते  हैं ,
बच्चे  होते  हैं ,
और  बूढ़े  हो  जाते  हैं ,
फिर  अफ़सोस  करते  हैं ,
कि ,  सब  किया जीवन  में , 
मगर  प्यार  क्यों  नहीं किया ?  

पहले  घर  लेते  हैं ,
उसमे  परदे - फर्नीचर  लगाते  हैं,  
फिर  रिश्तों के  हिसाब से बने  कमरों  में ,
खुद   को  कैद  कर  पूरी  खामोशी  से  चिल्लाते  हैं ,
कि ,  हमने  मकान  क्यूँ  लिया , घर  क्यूँ  नहीं  लिया  ?

करोड़ो  कीड़ों - मकोड़ों  के  बीच ,
अपरिचित सी  शक्ल  लिये ,
जीवन  गुजारते  हम , हमारे  दोस्त  , हमारे  अपने ,
मर  जाते  हैं  अंततः  हम  सब ,
मगर  समझ  नहीं  पाते कि , 
हम  तो  आखिर  इंसान  हैं  ना ,
फिर  जीवन  उन  कीड़ों  से  हट  कर  क्यूँ  नहीं जीया  ?

चलो  आज  से  बजाय  खिड़कियों  पे  परदे  लगाने  के ,
खिड़कियों  के  बाहर की  दुनियाँ  को  साफ़  करते  हैं !
दूसरों  के  खिलाफ़  नहीं  ,
आज  से  खुद  ही  के  ख़िलाफ़  ज़ेहाद  करते  हैं !
जीवन  निश्चित  है  फिर  मौत  भी  निश्चित , 
चलो , जी  चुके  गर  नफरत  से , तो  प्रेम  से  मरते  हैं !
किसी  ने  चुटिया  दी  लंबी ,
किसी  ने  टोपी ,
तो  किसी  ने पगड़ी !
याद  रखो , जरुर  बच्चे  ही  इक  दिन  पूछेगें ,
कि , इंसानों  का  वेश  क्यूँ  नहीं  दिया  ??