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Tuesday, July 12, 2016

शब्द तो आंखों में रहते हैं


मैंने अपनी आवाज निगल ली है ;
लोग उसे ख़ामोशी कहते हैं !

आप ढूंढो चुपचाप सी चुप्पी में, 
एक आवाज ;
आप चुन लो चुपचाप सी चुप्पी से, 
एक साज !

पूरी पूरी आवाज में, 
और पूरे पूरे साज में भी, 
नहीं सुन पाओगे एक भी शब्द !
शब्द आवाज में रहते ही नहीं बंधु ;
शब्द तो आंखों में रहते हैं ;
लोग जिसे ख़ामोशी कहते हैं !

जिसने भी अपनी आवाज उगल दी, 
वो फंस गया जंगल की रात में !
नहीं जी, मेरा दिल कोई भारत की संसद नहीं है ;
नहीं बनाने कोई कानून मुझे शोर शराबो में ,
न खुद के लिये, 
न दूसरों के लिये !
मैं सुकून से हूँ, 
अपनी ख़ामोशी की बात में !


शब्द जो आंखों में रहते हैं, 
वही तो आवाज बन पाते हैं !
चलो ; आज से हम ख़ामोश रहते हैं !!