Showing posts with label मैंने बांहें फैला दी हैं. Show all posts
Showing posts with label मैंने बांहें फैला दी हैं. Show all posts

Friday, October 17, 2025

मैंने बांहें फैला दी हैं



आओ , मैंने  पकड़   लिया   प्रेम   का एक  सिरा,
दूसरा  तुम  पकड़ो,
चलो , यादों  का  झूला  बनाया  है ,
तुम  झूलो  मेरे  साथ , मुझे  जोर  से   जकड़ो !

सातों  फेरों  में  था  एक  अनुबंध ,
एक  हिस्सेदारी  थी ,
मेरे  संपूर्ण  के  आधे  की !
लो , तुम  मेरा  आधा  नहीं  समूचा  हिस्सा ,
नहीं  चाहिये  एक  कण   भी  मुझे  मेरे हिस्से  का !
मेरे  लिये  केवल  तुम  ही  काफी  हो ,
केवल   और  केवल  तुम मेरे  हिस्से  में  आ  जाना !

सुनो , जलेबियाँ   सीधी    नहीं  होती ,
मगर  मीठी   तो  होती  हैं !
मैं  तो  मेहंदी  के  मानिंद  हूँ ,
हरे  से  लाल  होता  हूँ ,
आओ  ,खुशियाँ  फंसा  लो  , मैं  जाल  होता  हूँ !
वो  मेरा  सपना था  जो  टूट गया ,
पगली ,  तू  क्यों  रोती  है  ?

मैंने  बांहें  फैला  दी  हैं ,
जब  चाहो  आ  जाना ,
समा  जाना  मेरे  सीने  में , देना  हाथों  में  हाथ !
तुम्हारे  जिस्म  पे  शर्तों  के  आभूषण  चुभते  हैं ,
छिल  जायेगा  मेरा  सीना , 
मुझे  नहीं  मंजूर  एक भी  खरोंच  मेरे  सीने   पर ,
क्यों  की  वहां  तुम  रहती  हो , मेरी  यादों  के  साथ  !!