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Friday, October 17, 2025

मेरे बेटे को कभी ना रुलाना

बस  मांगी  थी  इक  मुस्कान ,
बेटे  ने  वो  पूरा  पार्क  ही  तोहफ़े  में  दे  दिया, 
जहाँ  सुबह -सुबह , 
समूह  बना कर  ,
जोर -जोर  से  हँसते  लोग जमा होते  हैं !
फिर  कभी  कुछ  नहीं माँगा  बेटे  से ,
फिर  कभी पता  तक  नहीं  चलने  दिया ,  
कि , हम  भी  कभी  रोते  हैं !!

पार्क  में  जोर-जोर  से  हँसते  लोग ,
इक  दूसरे  पर  ही  तो  हँसते  हैं  !
हम  शहरी  लोग  उम्र  के  आखरी  पड़ाव  में ,
ऐसे  ही  किसी पार्क  में ,
टूटे - फूटे  समूहों  में  स्वत : स्वत : फंसते  हैं !

कच्ची  बुनियादों  पे  खड़ी  दीवालें  ,
ता -उम्र  रोती  हैं ,  
बेशक  समझदार  लोग  बताते  हैं  ,
वो  तो  नमी  होती  है !
नम  दीवालों    पे  बड़ा सा  मुस्कुराता  फोटो  लगाते  हैं ,
कम  से   कम  खर्च  में  पूरी  दीवाल   छिपाते  हैं !
सचमुच  हम  ही  बुद्धू  थें ,
आजकल  के  बेटे  तो  समझदार  होते  हैं ,
उन्हें  सब  होता  है  पता ,
कि , हम  कब - क्यूँ - कैसे  रोते  हैं ! 

हे  ईश्वर ,
हमने  तो  क्षमा  का  भुगतान ,
अपनी  साँसों  से  कर  दिया ,
मेरे  बेटे  को  कभी  ना  रुलाना ,
बेटे   हमारे  अपने  बचपन  सहीत ,
अब  भी  हमारे  दिलों  में  बसते  हैं !!