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Friday, October 17, 2025

मुझे विश्वास है




हम  अपने   व्यक्तिगत  होते  परिचय   को , 
मान  बैठते  है  उपलब्धि  !

बच्चे    के  जन्म  के   साथ  मिठाइयाँ   बांटने , 
और   किसी  परिचित  की  मौत  पर, 
 रो लेने  की  प्रक्रिया  से , 
हम   खुद को   मानव  साबित   कर  बैठते  हैं  !
क्यों    नहीं  रोती  आँखे   ,
अपरिचित  की  मौत  पर ?
क्यों   हमारे    खुश  होने  के  मापदंड   भी , 
पहले से  तय  होते  है  ??

ता  उम्र  बिखराते  चलते   हैं, 
सजीव- निर्जीव  संबंध  एवम  साधन , 
नहीं  समेट    पाते  अंतत :  !  

चलो   प्रिय  !
दिमाग  की  दीवारों  को  खुरचें , 
पूरा   मवाद   निकलने    तक  खुरचें , 
मुझे   विश्वास   है , 
पूरा  मवाद  निकलने  पर   ही ,
हम  सामान्य  हो  पायेंगे , 
और  सामान्य होना  ही तो   होगी  हमारी  उपलब्धि!