Sunday, November 29, 2015

हम तो स्वयं सिद्ध विश्वगुरु हैं जी

मेरे चुप रहने की हद में, 
बैठा रहता है नग्न आक्रोश, 
वो आक्रोश, 
जिसकी हैसियत मापी जाती है, 
हिजड़ों की तालियों से, 
या फिर संसद की गालियों से !

क्यों चालीस प्रतिशत लोग धार्मिक पैदा होते हैं?
क्यों बाकी साठ प्रतिशत धर्म निरपेक्ष पैदा हो रोते हैं ??

हम जाहिल ; सांस लेने को ही जीना मानते हैं ;
अंदाज का भैंगापन इतना, 
कि छप्पन इंच को ही सीना मानते हैं !

चौदह सौ साल पहले किसी ने, 
वर्जित कर दी थी माँ की पूजा, 
कायदे बनाये थे जीने को ;
आजकल जीने को बम बना रहे हैं ;
ईश्वर से रिश्ता रखने की जिद में, 
इंसानियत से रिश्ते कम बना रहे हैं !

धर्मों के शागिर्द अभी और नंगे होने बाकी हैं ;
धर्मों की किताबों से अभी और पंगे होने बाक़ी हैं !
किताबें आसमानी हों या जमीनी ;
हमें जीने क्यूं नहीं देतीं ?
जीने का सलीका बताती किताबें, 
हंसना क्यूं नहीं सिखाती ;
खुशी पीने क्यूं नहीं देतीं ??

अपनी अपनी पूजा पद्धति को सही ठहराते ठहराते ;
हम खुद गलत बन जाते हैं ;
गलत इस कदर हो जाते हैं, 
कि खुद को ही सही बताते हैं !

हम कुएँ में बैठे एक सौ पच्चीस करोड़ लोग, 
पूरी दुनियां के लिये अजूबा हैं !
जिस विष को खा तड़पते हैं पूरी उम्र ;
संतानों में भी उसी के बीज बोते हैं !
कुएँ से बाहर की दुनियां में है रौशनी ;
जो पसंद नहीं है हमें !
हम तो स्वयं सिद्ध विश्वगुरु हैं जी
जो मात्र हिन्दू मुस्लिम होने के लिये ही
जन्म लेते हैं; मरते हैं;मारते हैं; जागते हैं;सोते हैं !!
---------------------- तनु थदानी

Wednesday, November 25, 2015

आ के घुल जाना मेरी हँसी में

मेरी मुस्कान की सरहदें, 
खुली हैं चारों दिशाओं से ;
मैं जब हँसु ; आ के घुल जाना मेरी हँसी में !

मैं दरवाजा खटखटाऊंगा ,
तुम दौड़ कर आओगी ,
खोलोगी दरवाजा ; मुझसे लिपट जाओगी ,
बिना ये देखे
 बिना ये परवाह किये
 कि कोई साथ भी है मेरे !
मैं बंध जाऊंगा तेरी बांहों से ,
पुरानी यादों में जा के ,मुस्कुराना, मेरी हँसी में !

दिल में दिमाग की घुसपैठ ,
मार डालती है प्यार के ख्वाबों को !
देर तलक छानना अपने ख्वाब,
हकीकत के टुकड़े छनेंगे जरूर ,
जिन्दा ख्वाबों का अंतिम पड़ाव ,
मिलता है प्यार की राहों से,
आना खुद को भी भूल जाना मेरी हँसी में !

सपाट सी जिंदगी को खोदना ,
होठों पे मुस्कान गोदना  ;
तब नहीं बोलते हम
 जब बातें करती हमारी सांस है,
ये ही हमारे तुम्हारे होने का सारांश है ;
जो जाहिर हो जाते हैं निगाहों से ;
बेशक रूठना,
बेशक छिपना ,
मगर लौट आना मेरी हँसी में !
मैं जब जब हँसु ;आ के घुल जाना मेरी हँसी में !!

हम और तुम

फिर मिलेंगे, 
कहते हैं विदा होने से पहले, 
कितने आशावान हैं हम और तुम !

बेवकूफियों के अस्तर लगी जिंदगी जीते हैं ;
कल का नहीं पता, 
मगर अगले कई सालों की रूपरेखा में हैं उलझे ;
हरे से लाल हैं होते, 
कि जैसे पान हैं हम और तुम !

हमारे जिस्म के भूगोल का, 
इतिहास बनने का गणित , 
पूरा दर्शन शास्त्र है !
घड़ियां तो आईना होती हैं, 
टिक टिक कह कह, 
नहीं टिकती हैं खुद, 
न देती हैं टिकने ;
बताती हैं -
इसी परिपथ में घूमना ही जीवन मात्र है  !
तुम मुझमें, 
 मैं उतरता हूँ तुझमें, 
 खोजते हैं जीने को प्यार के पल ;
कैसे मान लू्ं कि मात्र सांसों की खान हैं हम और तुम !!