Friday, October 17, 2025

आना भईया कभी हमारे उत्तर प्रदेश आना

तय कुछ भी नहीं होता है पहले से ,
ना समर्थन में कुछ,
ना ही विरोध में !

जब खाना नहीं मिलता भूखे को ,
वो तय करता है खाना छीनना !
भूखे का खाना छिनना कतई समर्थन नहीं होता, आगजनी का ! 
भूखा सिर्फ भूखा है ,
यही तय है पहले से ,
चाहे वो चुपचाप है या है वो क्रोध में !

हम हिन्दू मुसलमान होने से पहले ,
नहीं तय कर पाते ,
कि हम पहले भूखे नंगे हैं !
क्यूँ नहीं समर्थन दे पाते हैं पहले भूख को ?
क्यूँ गुजार देते हैं फटेहाल जीवन ,
अपने अपने धर्मों के शोध में ??

आंखों से सपने बीनना ,
लिखना-पढ़ना फिर बेरोजगार हो जाना ,
आना भईया कभी हमारे उत्तर प्रदेश आना ,
केवल यहाँ पहले से तय होता है सब कुछ ,
तुष्टीकरण से ले कर फसाद व विवाद तक ,
मुजफ्फरनगर से ले कर फैजाबाद तक ,
मरना तो आम आदमी को ही है भईया !
लाशों पे राजनीति करने वाले ,
सदा दिखेंगे ,
सफेद झक्क कुरतों के भीतर आनंद व विनोद में !!

अब बच्चों को तय करना है

तुम आस्था को तर्कों से बाँधते हो ना ?
मगर पहले तय तो कर लो ,
लोग तर्कों में क्या क्या सानते हैं !

तर्क मेरे बच्चे की तरह होते हैं,
मगर आस्था तो माँ  की मानिंद लगती है !
बच्चे हो चुके हैं प्रगतिशील ,
दो रंगों को मिला तीसरा रंग बनाते हैं ,
भाषाओं पर कब्जा करने वालों को ,
समझते हैं पढ़ा लिखा ,
संकेतो को भी नई भाषा बताते हैं !
माँ ने कभी भाषा नहीं बदली ,
क्या माँ भी कभी ठगती है ?

डूबता हुआ सूरज ,
या उगता हुआ सूरज ,
बच्चों ने अमान्य कर दिया ,
बताया , पृथ्वी ही घूमती है !

माँ ने डूबते सूरज को पूजा , फिर उगते सूरज को ,
पूरे परिवार की सलामती के लिये रखा उपवास!
क्यों कि उसे सूरज से मतलब है ,
जिसकी रौशनी में वो बच्चों को देखती है,
उन्हें प्यार करती है , उन्हें चूमती है !

अब बच्चों को तय करना है कि ,
वो माँ को कितना मानते हैं ??







करोगी दोस्ती मेरी खामोशी से ?




मेरी खामोशी है मेला कुंभ का ,
जहां बहुत कुछ छूट जाता है,खो जाता है !

मेरी खामोशी है धरातल चाँद का ,
जहां नहीं है गुरुत्वाकर्षण !
जब कभी उतरता हूँ, 
 अपनी खामोशी में,
हो जाता हूँ वजनहीन ,
गोया भार कहीं सो जाता है !

मेरी खामोशी है फुटपाथ,
पूरी चहलक़दमी,
नहीं ठहरता है कोई,
न ही कोई किसी का हो पाता है ! 

करोगी दोस्ती मेरी खामोशी से ?
शर्त है ; ढेरों बातें करनी होंगी !
मैं कभी चुप नहीं रहता अपनी खामोशी में ;
मगर देखो ना ;
हर वो हो जाता है निरंतर चुप ;
जो मेरी खामोशी में उतर दाखिल हो जाता है !!

ये कोई कविता नहीं है

बूंद बूंद कथानकों में
 फंसती हैं जीवित कथाऐं !
जब मात्र कमाने के लिए पढ़ते हैं बच्चे,
पढ़ लिख कर कमाते हैं सिर्फ पैसे,
घुटने टेकती है उम्र तब पैसों के आगे,
अनवरत बहते जीवन पर ,
तैरती रहती हैं व्यथायें !


कभी आना मिलना अपने सूखे से दिल से,
कभी बतियाना अपने ख्वाबों से ,
थोड़ी सी खुशियाँ भी कमाना ,
कभी माँ के पास भी आना ,
इससे पहले कि माँ कहीं गुम हो जाये ,
इससे पहले कि कोई तुमसे सहानुभूति जताये !


ये कोई कविता नहीं है, 
 नहीं है कोई कथा ,
विवशता लिखी है परदेशी की ,
सूत्रधार अचंभित है,क्या छोड़े ?क्या बताये??
----------------- तनु थदानी

फिर बताओ

हमारी तमीज को टटोलते वो लोग ,
रात का इंतजार बस इसलिए करते हैं ,
कि नंगापन उनका छिप जाये !

भेड़ियों ने नेलपालिश खरीदी ,
गधो ने पायजामे ,
हम दोनों घटनाओं पर  शोध  करते रहें ,
और पूरा घर भर गया बंदरो से ,
चकित हुँ कि अब ये कहाँ से आये ?

खटिया आज भी बाहर नहीं है चलन से ,
बस सोफे वालों ने ,
खड़ी कर दी है हमारी खटिया !
गरीब तो महज मुहावरे से चूक जाते हैं ,
खड़ी तो खटिया ही होतीं हैं ना ,
सोफे तो महज जाते हैं सरकाये !

बिक जाने दिये हमने सपने अपने ,
खुद ही बेचे तो मलाल कैसा ?
उन्हें तो चाहिए था पैसा ,
अनजाने ही अपनी आबरु बेच आये !
हम तो गिनने में रहें व्यस्त ,
कि हमने कितने कमाये !

उन्हें लगता ही नहीं कि  वो बे-ढंगे हैं ,
उन्हें कतई नहीं शर्म की वो  नंगे हैं ,
वो तो आदतों की तरह हममें बैठे हैं घुलमिल ,
फिर बताओ ,
क्यूँ हम काले चश्मे लगायें ??
----------------------- तनु थदानी

ये मैं नहीं लिख रहा कविता


मेरे आंसुओं का खुशबू से तर हो जाना ;
नि:शब्दता को भींचना गले लगाना ;
जाहिर है तुमने कुंडी खटखटाई है ;
तुम्हारे साथ मेरी मुस्कान वापस आयी है !


नाहक पढ़ीं किताबें, 
कर डाले कागज़ काले ;
सीख न पाये दिल की भाषा पढ़ पाना  !
बहुत खोजा तेरे होने का मतलब ,
बीते कल को ढ़ोने का मतलब ;
मतलब का एक शहर समूचा ,
हाथ पकड़ना ; गुम हो जाना ;
फिर से तेरा लौट के आना ;
चुपचाप पड़े बिस्तर का गाना ;
जाहिर है हर सिलवट मुस्कायी है ;
सचमुच मेरी मुस्कान वापस आयी है !


देखो सागर का उछलना - मचलना ;
समझो उसका आनंदित हो जाना ;
जाहिर है उसमें नदी समायी है ;
ये मैं नहीं लिख रहा कविता, 
ये तो मेरी मुस्कान वापस आयी है !!
------------------- तनु थदानी

मेरा आमन्त्रण है तुम्हें




हे ईश्वर !

तुम्हारे  द्वारा  दिया गया   आँखों   का  पानी ,
कभी  नहीं  बहाया  मैंने  आंसू   बना कर ,
सुरक्षित  रखा इक  शर्म   के लिए  मात्र  !

हे  ईश्वर !
मैं   सच  कहता हूँ , 
हर   घर से  विसर्जित  होती  नालियों  में , 
मैंने  वो  ही पानी   देखा , 
अन्दर हर  घर  के  उस  शर्म  को  बेशर्म   होते देखा !

काश !
मैं  तुम्हारे  लिए  खुद  को  सुरक्षित  रख  पाता !
जैसा    तुमने   भेजा  था  निर्मल  और  स्वच्छ ,
वैसा  तुम  तक लौट  पाता  ....................

हाँ !
मैं   केवल  तुम्हारा  आलिंगन  चाहता  हूँ ,
मगर   अभी  नहीं !
मुझे  अपने  ऊपर  लगाए   ,
तमाम  कीचड़   साफ़  करने की  क्षमता  दो  ईश्वर ,
जिस -जिस  ने  भी मुझे  कीचड़  लगाया ,
उनके   हाथ भी  साफ़   करना ईश्वर ,
ताकि , 
जब भी  वो  तुमसे  क्षमा  मांगने हेतु  हाथ जोड़े ,
तो कम से कम हाथ  साफ़  व  स्वच्छ  हो  उनकें  !

मैं  नहीं  जानता , 
हे ईश्वर तुम्हारे  निराकार में   समाहित  आकार को ,
अगर जानता , 
तो  उस  आकार  में  तुम्हारी गोद  ख़ोज  लेता ,
जहां  मैं दुबक  कर -  सिमट कर बैठता ,
और  तुम्हारे हाथों का स्पर्श  सर पे महसूस  करता !!

तुम्हारे नाम से चलाते मजहबी दुकानदारों को, 
लड़ते  रक्त- रंजित  होते  देखा है अब तक ,
क्या ऐसा  संसार  मंजूर था तुम्हे ?
शायद नहीं ........
तभी तो  सर्वज्ञ  मानने  के  बावजूद  ,
ये भी   जानते हैं ,
कि  तुम हो  ही  नहीं   इस संसार  में !
अगर  होते  तो ,
श्रृन्गारित   होती   हमारी आत्माएं   प्रेम से !!

हे  ईश्वर !
मेरा आमन्त्रण  है  तुम्हे -    
आओ  अपनी  बनाई  इस  दुनिया  में !
मगर   किसी  रूप  में  न  आना ,
ना ही  शब्दों  और  किताबों  में  आना ,
आना  तो  हमारी  आँखों  में  पानी  बन  कर  आना ,
जो  संभाल रखे  तुम्हे ,उसी का  हो  के रह जाना  !! 
----------------------------- तनु थदानी