Thursday, August 28, 2025

फिर बताओ_तनु थदानी

हमारी तमीज को टटोलते वो लोग ,
रात का इंतजार बस इसलिए करते हैं ,
कि नंगापन उनका छिप जाये !

भेड़ियों ने नेलपालिश खरीदी ,
गधो ने पायजामे ,
हम दोनों घटनाओं पर  शोध  करते रहें ,
और पूरा घर भर गया बंदरो से ,
चकित हुँ कि अब ये कहाँ से आये ?

खटिया आज भी बाहर नहीं है चलन से ,
बस सोफे वालों ने ,
खड़ी कर दी है हमारी खटिया !
गरीब तो महज मुहावरे से चूक जाते हैं ,
खड़ी तो खटिया ही होतीं हैं ना ,
सोफे तो महज जाते हैं सरकाये !

बिक जाने दिये हमने सपने अपने ,
खुद ही बेचे तो मलाल कैसा ?
उन्हें तो चाहिए था पैसा ,
अनजाने ही अपनी आबरु बेच आये !
हम तो गिनने में रहें व्यस्त ,
कि हमने कितने कमाये !

उन्हें लगता ही नहीं कि  वो बे-ढंगे हैं ,
उन्हें कतई नहीं शर्म की वो  नंगे हैं ,
वो तो आदतों की तरह हममें बैठे हैं घुलमिल ,
फिर बताओ ,
क्यूँ हम काले चश्मे लगायें ??
----------------------- तनु थदानी

Saturday, August 23, 2025

ये कोई कविता नहीं है_ तनु थदानी

बूंद बूंद कथानकों में
 फंसती हैं जीवित कथाऐं !
जब मात्र कमाने के लिए पढ़ते हैं बच्चे,
पढ़ लिख कर कमाते हैं सिर्फ पैसे,
घुटने टेकती है उम्र तब पैसों के आगे,
अनवरत बहते जीवन पर ,
तैरती रहती हैं व्यथायें !


कभी आना मिलना अपने सूखे से दिल से,
कभी बतियाना अपने ख्वाबों से ,
थोड़ी सी खुशियाँ भी कमाना ,
कभी माँ के पास भी आना ,
इससे पहले कि माँ कहीं गुम हो जाये ,
इससे पहले कि कोई तुमसे सहानुभूति जताये !


ये कोई कविता नहीं है
 नहीं है कोई कथा ,
विवशता लिखी है परदेशी की ,
सूत्रधार अचंभित है,क्या छोड़े ?क्या बताये??
----------------- तनु थदानी

Thursday, February 8, 2018

Tanu thadani तनु थदानी मैं तो दलदल में भी बहता हूँ

मैंने अपनी कई खामोश रातें
कुकर में पकाई हैं !
सीटियाँ बजती हैं,
मैं सीटियों को सहता हूँ ,
सब खुश रहें घर में
महज़ इस बात की खातिर,
मैं दूर कमाने को अकेला रहता हूँ !

अपने आँसुओं को पत्थर बनते देखना ,
यही तो दिनचर्या है ,
वज़नहीन साँसों को अंदर बाहर फेंकना,
यही तो दिनचर्या है !
तुम बेशक दिनचर्या कहो,
मैं तो दलदल कहता हूँ,
इसी दलदल में मेरी जिन्दगी कसमसाई है !
लोग फंसते हैं दलदल में,
मैं तो दलदल में भी बहता हूँ ,
दूर बहुत दूर खुद के साथ अकेला जो रहता हूँ !!

Saturday, December 30, 2017

धत् पगली

धत् पगली

मेरी मुस्कान एक अलमीरा है बहुत बड़ी,
भीतर आँसू हैं मेरे,
कभी देखा है मुझे रोते हुए ??

पूरी गृहस्थी को अनवरत ढ़ोता खींचता जाता हूँ ;
छिल जाते हैं कंधे , हाँफता हूँ ,रुकता हूँ ,
फिर मुस्कुराता हूँ !
धोखे में न आना ,
ये तो खुशी से हैं मेरी आँखें भरी भरी !!

गले मिलना कभी आ के,
तुम भी मुस्कुराओगी ,
मेरे कंधे गीले कर ,
चुपचाप चली जाओगी ,
पर मुझे नहीं बताओगी !

अजीब हैं न हम ,
करते कुछ हैं,
दिखाते कुछ हैं ,
हँसते बनावटी जरूर हैं ,
मगर रोते सचमुच हैं !
धत् पगली ,तू क्यूँ रोती है ;
मैं हूँ न तेरे साथ, हर क्षण, हर घड़ी !!
----------------------- तनु थदानी

Sunday, April 30, 2017

तू मेरा हाथ मत छोड़ना माँ !

तू मेरा हाथ मत छोड़ना माँ !
----------------------
जब भी घर को बचाने के लिये
उसे बाहों में भर लेता हूँ ,
मेरी ही छाया मेरे धैर्य को निगल
ध्वस्त्  कर देती है मुझे !

माँ , जब तू काँपती है अपने ही घर की कंपन में ,
तब शर्म  से मेरी आंखे झुकती हैं ,
असमर्थ हो जाता हूँ , सो मेरे कंधे भी झुकते हैं !

माँ , सच कहता हूँ ,
हार गया मैं अपनी छाया से !
न बैठा हूँ अब तलक , न ही सोया हूँ ,
मेरी पीठ दुखती है , मेरे पैर दुखते हैं !!

मेरे कमरे के कोने में दुबकी हँसी की गवाही ले लो ,
मैं सचमुच नहीं मिला वर्षों से उससे !

बचपन में तेरे लिये पूरा शहर खरीदने वाला मैं ,
एक कतरा मुस्कान न ला सका तेरे लिये ,
बड़े होने का दंश झेलता हूँ ,
तू मेरा हाथ मत छोड़ना माँ !
बह न जाऊं मैं ,
मेरे आंसू तो तेरे आंचल में ही रुकते हैं !!😢😢

Tuesday, March 21, 2017

ऐ कविता तनु थदानी tanu thadani

ऐ कविता ,
जिस दिन मैं रोया था पहली बार ,
बस तू ही थी जो रोयी थी मेरे साथ !
कहाँ से थी आयी ,नहीं मालूम ,
तू मिली तो मैं व्यक्त हुआ
तू मिली तो गौरेया के मायने समझ मेंं आये ,
मैं  सूख गया था आँसुओं में डूब कर ,
तू मिली तो तुकबंदियों ने अपने फटे पुराने कपड़े भी दिये,
ढ़क दिया नंगापन मेरा ,
तू मिली तो मैं खुद की घड़ी का वक्त हुआ !
आज मैं कविता दिवस पर  तुम्हें देता हूँ बधाई ,
मैं किस्मत वाला हूँ  जो तू मेरे हिस्से में आयी !
---------------------  तनु थदानी

Sunday, September 11, 2016

tanu thadani ki kavitaayen: tanu thadani तनु थदानी अरे कोई तो बताओ उसे

मेरी छाया का मुझसे था वादा ,
मेरे साथ साथ चलने का !
मेरी छाया को पूरा था हक ,
मेरे साथ साथ रहने का !

मेरे साथ  रहते रहते ,
घोल कर पी गयी घर की दिवारें ,
फिर बताया मुझे, जहां वो आती है नजर
उस फर्श को भी वो खायेगी !

यहाँ मसला उसकी भूख प्यास का नहीं ,
मसला है मुझको छलने का !
दिवार व फर्श हैं तो अस्तित्व है उसका ,
दिवार व फर्श होंगे ,तभी तो वो दिख पायेगी !

अरे , कोई तो बताओ  उसे ,
मैं रौशन हूँ तो वो है ,
मुझे अंधेरों में ढ़केल ,
वो खुद भी तो मर जायेगी !!